संवहनीय विकास ही विकल्प: एलिजाबेथ गोगोई

एलिजाबेथ गोगोई
एलिजाबेथ गोगोई
द्वारा प्रकाशित-नवंबर 24, 2014
विषय-वस्तु: पर्यावरण

जिस तरह देश में एक ओर बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं तो दूसरी तरफ सूखे का दंश बढ़ता जा रहा है, क्या इसका कोई संबंध जलवायु परिवर्तन से है?

एलिजाबेथ गोगोई: आईपीसीसी की नवीनतम पांचवीं एसेसमेंट रिपोर्ट में दिखाया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग शुरू हो चुकी है। दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों पर भी यह लागू है। इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में गर्म हवा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। बारिश के स्तर में उतार-चढ़ाव तेज होता जा रहा है। साथ ही पूरे इलाके में अत्यधिक वर्षा के मामले भी लगातार हो रहे हैं।

मौसम संबंधी आत्यांतिक घटनाओं की वजह से बाढ़, भूस्खलन, लू और सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं और यह सब इसी रुझान का नतीजा है। यह लोगों के जीवन और उनकी जीविका पर नकारात्मक असर डाल रहा है। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2008 में गंगा की सहायक नदी कोसी में बांध टूट गया और नेपाल में 60 हजार व भारत में 35 लाख लोग बेघर हो गए। पूरे इलाके में परिवहन के साधन और बिजली आपूर्ति ठप हो गई।

भारत जैसा देश जो विकास की जद्दोजहद में भी जुटा हुआ है, उसके लिए टिकाऊ दीर्घकालिक विकास के लिए क्या नीति होनी चाहिए?

एलिजाबेथ गोगोई: समावेशी विकास के लिए भारत ने अपनी नीति का एलान पहले ही कर दिया है। १२वीं पंचवर्षीय योजना का उपशीर्षक ही है, ‘तेज, दीर्घकालिक और अधिक समावेशी विकास’। पर्यावरण की रक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के उपाय अपनाने को ले कर इसमें अनेक संदर्भ मिलते हैं। जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (एनएपीसीसी) और इससे संबंधित मिशनों में इस बात की पर्याप्त चर्चा मिलती है कि जलवायु परिवर्तन के लिहाज से भारत को क्या करना है।

‘इंडिया स्टेट ऑफ फोरेस्ट रिपोर्ट 2013’ के मुताबिक मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 77,522 वर्ग किलोमीटर जंगल हैं। राज्य भर में हो रहे अवैध कोलया खनन को देखते हुए राज्य को क्या कदम उठाने चाहिएं जिससे राज्य का वन क्षेत्र कायम रहे?

एलिजाबेथ गोगोई: मध्य प्रदेश सरकार ने एसएपीसीसी के जरिए यह तय किया है कि इस लिहाज से क्या किए जाने की जरूरत है। मध्य प्रदेश में वन परिस्थितिकि तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के आकलन में संकेत मिलते हैं कि अल्पकालिक प्रभाव के तौर पर राज्य का लगभग 23% वन क्षेत्र प्रभावित हो सकता है, जबकि दीर्घ काल में यह 50% तक वन क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। मध्य प्रदेश में बदलती जलवायु यहां के वन क्षेत्र के प्रसार और इसके स्वरूप को प्रभावित कर सकती है।

एसएपीसीसी में वन क्षेत्र के संरक्षण के लिए विभिन्न उपाय तय किए गए हैं। इसमें वन प्रबंधकों, अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ ही संयुक्त वन प्रबंधन समिति की क्षमता में बढ़ोतरी और इस काम में लोगों की साझेदारी को बढ़ाना शामिल है। वन प्रशासन को बेहतर करने में अवैध खनन पर रोक भी शामिल है। हालांकि इसके लिए उच्च स्तरीय राजनीतिक समाधान और दृढ़ संकल्प के साथ ही बेहतर निगरानी और उत्तरदायित्व तय करने की भी जरूरत होगी।

सात अन्य राज्यों के साथ ही मध्य प्रदेश ने भी जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्ययोजना तैयार की है। आपके मुताबिक राज्यों की कार्ययोजनाएं कितनी प्रभावी हैं?

एलिजाबेथ गोगोई: एसएपीसीसी विकसित करने को ले कर अपने देश में जो प्रयास हुए हैं, ऐसा उदाहरण दुनिया भर में कहीं भी मिलना मुश्किल है। इससे बाकी के देश बहुत कुछ सीख सकते हैं।
एसएपीसीसी को तैयार करने और अब उसको लागू करने में मध्य प्रदेश ने वास्तव में एक दिशा दिखाई है। एसएपीसीसी के तहत प्राथमिकताएं तय करने में राज्य ने जिस तरह विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया, वह वाकई काबिले तारीफ है। अब यह जलवायु परिवर्तन पर ज्ञान केंद्र स्थापित करने के साथ ही विभिन्न विभागों में इसके लिए क्षमता निर्माण कर इसको लागू करने के लिए कार्यरत है।

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया