महिलाओं के लिए जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौती: अदिति कपूर

अदिति कपूर
अदिति कपूर
द्वारा प्रकाशित-नवंबर 24, 2014
विषय-वस्तु: पर्यावरण

आपके मुताबिक जलवायु परिवर्तन का लैंगिक मुद्दों से क्या संबंध है?

अदिति कपूर: आम तौर पर लोगों को नहीं लगता कि जलवायु परिवर्तन और लैंगिक विषयों का आपस में कोई संबंध हो सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि अगर आप भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करें तो यह आपकी खेती को प्रभावित करता है। इससे यह तय होता है कि आपदा का आप पर कितना असर होगा। दोनों ही मामलों में महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। अगर प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से देखें तो कृषि से संबंधित 70 फीसदी से ज्यादा काम महिलाएं ही करती हैं। योजना आयोग के मुताबिक चारे और जंगल से मिलने वाले उत्पादों के मामले में भी अधिकांश काम महिलाएं ही करती हैं। मतलब यह है कि अगर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हमारी प्राकृतिक संपदा पर पड़ता है तो उससे सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाएं ही होती हैं। आपदाओं की बात करें तो संयुक्त राष्ट्र का एक अध्ययन है जो बताता है कि ऐसे में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की मृत्यु की आशंका 14 गुना ज्यादा होती है।

जब हम जलवायु परिवर्तन और लैंगिक मुद्दों की बात करते हैं तो मुख्य तौर पर तीन निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं- क) पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा प्रभावित होती हैं। ख) महिलाएं पहले प्रभावित होती हैं। ग) जलवायु परिवर्तन का सामना करने के उपायों के मामले में भी महिलाओं की स्थिति कमतर है। इसलिए जो लोग महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर काम करते हैं, उन्हें चाहिए कि वे जलवायु परिवर्तन के उन पर पड़ने वाले प्रभाव को ले कर भी सतर्क दृष्टि रखें।

भारत में पिछले दशक के दौरान सिविल सोसाइटी काफी मजबूत हुई है। जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरुकता फैलाने में यह किस तरह अपनी भूमिका निभा सकती है?

अदिति कपूर: सिविल सोसाइटी में तो थिंक टैंक, विभिन्न पेशेवर और लॉबिस्ट सभी आ जाते हैं। बल्कि मैं कहूंगी कि हर आम आदमी को जलवायु परिवर्तन के बारे में अधिक से अधिक जानने की जरूरत है। सभी संस्थानों को अपने काम के साथ जलवायु परिवर्तन के संबंध को समझना चाहिए। अगर कोई संस्थान डब्लूटीओ और सब्सिडी पर शोध कर रहा है तो उसे यह देखना चाहिए कि उसके काम का जलवायु परिवर्तन के साथ क्या संबंध है। इस विषय को मुख्य धारा में लाने की जरूरत है। क्योंकि इसका सभी अन्य विषयों से संबंध तो है ही, हमें तो बस उसे पहचानने की जरूरत है। यह सही है कि सिविल सोसाइटी को इसमें अहम भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन साथ ही सरकार और अकादमिक क्षेत्र को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। आम तौर पर लोग इस विषय को अहमियत नहीं देते, लेकिन जिस तरह से पर्यावरण में बदलाव आ रहे हैं, उसको समझने और इससे निपटने के लिए उपाय करने का समय आ गया है।

क्या आपको लगता है कि जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना लैंगिक मुद्दों को शामिल करने में सफल रही है?

अदिति कपूर: जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (एनएपीसीसी) ने सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया है कि महिलाओं पर इसका ज्यादा प्रभाव पड़ता है और उनके पास पुरुषों के मुकाबले संसाधन भी कम होते हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि जलवायु परिवर्तन संबंधी लैंगिक विर्मश के लिए उतना पर्याप्त है। दुर्भाग्य से जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्ययोजनाओं में शुरुआत में लैंगिक प्रभाव को ध्यान में रखा ही नहीं गया। हमने इस पर ध्यान दिया और विभिन्न राज्य सरकारों ओर केंद्र सरकार के साथ इसके लिए काम करना शुरू किया। सरकारों ने इस लिहाज से दिलचस्पी भी ली और अब आप देख सकते हैं कि कुछ राज्यों की कार्य योजनाओं में यह दिखाई देने लगा है। यहां तक कि केंद्र सरकार के स्तर पर भी आप देखेंगे कि एसएपीसीसी को मंजूरी देने वाली विशेषज्ञ समिति की बैठक के बिंदुओं में यह शामिल है कि एसएपीसीसी में लैंगिक चिंताओं को शामिल किया जाना जरूरी है।

नवीकरणीय ऊर्जा अब भी बहुत खर्चीली तकनीक है। भारत जैसे देश के लिए इसे कैसे सस्ता बनाया जा सकता है?

अदिति कपूर: हां, मैं मानती हूं कि नवीकरणीय ऊर्जा महंगी है, लेकिन क्या इसका मतलब है कि जीवाश्म (फॉसिल) इंधन सस्ता है? हम दशकों से इसे सब्सिडी देते आ रहे हैं और इसका कभी आकलन ही नहीं करते। जीवाश्म इंधन का उपयोग शुरुआती अवस्था में नहीं है, जबकि नवीकरणीय तकनीक अभी शुरुआती चरण में है। इस क्षेत्र में लगातार नए निवेश हो रहे हैं। इसलिए हमें अभी नवीकरणीय ऊर्जा को ज्यादा सब्सिडी देनी चाहिए।

जर्मनी और भारत में कार निर्माताओं को सब्सिडी मिलती है। अगर आप अर्थशास्त्र के हिसाब से देखेंगे तो जीवाश्म इंधन को वर्षों से भारी सब्सिडी मिलती रही है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने वर्ष 2012 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इसे 544 अरब डॉलर की सब्सिडी मिली है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा को उसी वर्ष में महज 100 अरब डॉलर की ही सब्सिडी मिली है। जरूरत इस बात की है कि उधर की थोड़ी सब्सिडी नवीकरणीय ऊर्जा को दे दी जाए और उसके बाद देखें कि नतीजे क्या होते हैं।

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया