मध्यप्रदेश में बेहतर वन प्रबंधन के लिए क्षमता वर्धन की आवश्यकता: डॉ किन्हल

डॉ किन्हल
डॉ. किन्हल
द्वारा प्रकाशित-जुलाई 28, 2014
विषय-वस्तु: वानिकी

मध्य प्रदेश एक लम्बे समय से वैज्ञानिक वन प्रबंधन में जुटा हुआ है. आपके अनुसार वन प्रबंधन की दिशा में मुख्य मुद्दे क्या हैं?

डॉ. किन्हल: मध्य प्रदेश ने लगभग १४-१५ हज़ार संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से बहुत अच्छा कार्य किया है. इस कार्य के दौरान मूल प्रेरणा यह रही है, कि किस प्रकार वनों का प्रबंधन और संरक्षण स्थानीय लोगों पर सौंप दिया जाए. मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र अपने कुल भौगोलिक विस्तार का ३० से ३१ प्रतिशत रहा है. इसमें जैव विविधता बहुत समृद्ध है और साल वनों से लेकर टीक और अन्य गैर टिम्बर वनोपज की भी बहुलता है.

मुख्य चुनौती ये है कि किस प्रकार वनों का अति दोहन को रोका जाए, और टिकाऊ दोहन या उपयोग को कैसे स्थापित किया जाए. ये अति दोहन स्थानीय जनसंख्या को उसके परम्परागत अधिकारों से वंचित कर रहा है. यह सबसे बड़ी चुनौती है जो हमारे सामने है.

आप मध्य प्रदेश को वन एवं वन्य प्रजाति संरक्षण की दिशा में कहाँ पाते हैं ?

डॉ. किन्हल : मध्य प्रदेश में लगभग दो हजार औषधीय पौधों की प्रजातियाँ हैं. पिछले लगभग बीस वर्षों के दौरान वन क्षेत्र में अचानक बड़ा बदलाव आया है. कुछ पुराने वन विभाग अधिकारी कहते हैं, कि हम हमारे संसाधनों की प्राकृतिक क्षमताओं का अतिक्रमण करके बहुत तेज विकास कर रहे हैं. हालाँकि यह विकास भी सही दिशा में जा रहा है, और इसे विज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान पर आधारित होना चाहिए. महत्वपूर्ण रूप से इस विकास या परिवर्तन को स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं और निर्भरताओं के ज्ञान पर आधारित होना चाहिए.  इस प्रयास ने गैर टिम्बर वनोपज प्रबंधन और औषधीय पौधों के विषय में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है.

जलवायु परिवर्तन और इससे जुडी चुनौतियों को आप वानिकी और वन प्रबंधन के सन्दर्भ में किस प्रकार देखते हैं?

डॉ. किन्हल: मध्य प्रदेश में अगर आप उष्ण कटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय वनों को देखें, तो वे जलवायु परिवर्तन खतरों के प्रति काफी हद तक लोचशील (रेजिलीएंट) हैं, यहाँ की वन्य प्रजातियाँ मौसम या जलवायु परिवर्तन को झेलने में काफी सक्षम हैं. कुछ समय से जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि और किसानों पर बढ़ता हुआ बोझ महसूस किया जा रहा है. खेती अनियमित होने लगी है, और इसका सीधा असर जंगलों पर पड़ रहा है. अब हमें अधिक सक्रिय होकर पहल करने की आवश्यकता है, ताकि हम जलवायु परिवर्तन को एक हकीकत के रूप में स्वीकार कर पायें और वनों के संरक्षण और विकास की समस्त कार्ययोजनाएं इस तथ्य को ध्यान में रखकर तैयार की जा सकें. हाल ही में २०१४ में भारत शासन ने एक कार्ययोजना में महत्वपूर्ण संशोधन किया है, जिसमे कि उपरोक्त कुछ तत्वों का समावेश किया गया है.    

जलवायु अपरिवर्तन की चुनौतियों से जनजातीय समाज की आजीविका पर क्या प्रभाव होने वाला है ?

डॉ. किन्हल: जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में फायदा कम होता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण खेती पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और दो खेतियों के बीच का खाली समय लंबा होता जाएगा. और यही वो ख़तरा है जो मुझे दिखाई देता है. जलवायु परिवर्तन का सीधा असर शायद जंगलों पर दिखाई ना दे लेकिन खेती पर इसके बुरे असर के कारण अप्रत्यक्ष रूप से जंगलों पर दबाव बढेगा. और इसके कारण वनों का क्षरण तेजी से होने लगेगा, खेती की समस्या वनों पर आ पड़ेगी. यह एक बड़ी चुनौती और समस्या है.

आपके अनुसार जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन के मद्देनजर ग्रामीण और जनजातीय समुदाय वन प्रबंधन में किस प्रकार बेहतर भागीदारी कर सकते हैं?

डॉ. किन्हल: अगर आप  १९८८ के बाद की नीतियाँ और प्रमुख फैसले देखें तो वे स्पष्ट रूप से कहते हैं, कि सभी वन और वनोपज स्थानीय लोगों के लिए हैं. लेकिन ऐसा व्यवहार में नहीं हो रहा है. आजकल नब्बे से लेकर पच्चानबे प्रतिशत तक वन उत्पाद कच्चे माल की तरह बेचा जा रहा है. और इसका फायदा स्थानीय लोगों को नहीं मिलता. ये फायदा फिर से स्थानीय लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. मैं इसे स्थानीय ज्ञान पर आधारित ग्रामीण  अर्थव्यवस्था कहता हूँ. अगर यह होता है तो हमें स्थानीय लोगों के संसाधनों को उन्हीं के बेहतर उपयोग के लिए सुरक्षित करना आसान हो जाएगा .

आपकी दृष्टि में शासकीय विभाग जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के मद्देनजर किस प्रकार वन प्रबंधन में अपनी बेहतर भूमिका निभा सकते हैं ?

डॉ. किन्हल: सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जो सरकार को निभानी चाहिए वो है - क्षमता वर्धन. वे सभी लोग जो जंगलों और वनोत्पाद पर निर्भर हैं, उनकी क्षमता बढाने की महती आवश्यकता है. अगर ये हो पाता है तो भविष्य के लिए उम्मीद जागेगी और लोगों को विशवास होगा कि वन संसाधन उनके लिए हैं, और इन संसाधनों के बाजार आधारित उपयोग के बारे में भी उनका विश्वास बढेगा. अगर यही काम स्थानीय लोगों की बजाय बाहरी लोग करते हैं तो वे इस काम को तेजी से जरुर करेंगे लेकिन वन और वनोपज से मिलने वाला फायदा भी स्थानीय जनजातीय या ग्रामीण लोगों को नहीं मिलेगा. इससे प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण होगा और यही वो ख़तरा है जो जलवायु परिवर्तन के कारण मुझे दिखाई दे रहा है.

                                                                                                                                                                                                                                   - वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया