भविष्य नवीकरणीय ऊर्जा का ही हैं – रमन मेहता

रमन मेहता
रमन मेहता
द्वारा प्रकाशित-नवंबर 28, 2014

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तो अब आसानी से दिखाई दे जाते हैं। भारत की इस संबंध में तैयारी के बारे में आपका क्या कहना है?

रमन मेहता: जलवायु परिवर्तन से तो अब कतई इंकार नहीं किया जा सकता। हाल में जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ इसका ज्वलंत उदाहरण है। इल लिहाज से भारत की रणनीति का जहां तक सवाल है, भारत ने राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की है। इसे राज्यों की कार्य योजना के रूप में विस्तार भी दिया जा रहा है। यानी, योजना के स्तर पर काम हो रहा है। लेकिन मेरा मानना है कि सरकारों ने अभी भी पूरी तरह से इसके लिए कमर नहीं कसी है। उदहारण के तौर पर जम्मू-कश्मीर में राज्य कार्य योजना तो है, लेकिन जब यहां बाढ़ और भारी बारिश आई तो राज्य आवाक रह गया।

नवीकरणीय ऊर्जा के फायदे को जानते हुए भी इसका जम कर इस्तेमाल नहीं हो रहा। भारत में इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिए क्या किए जाने की जरूरत है?

रमन मेहता: ऊर्जा क्षेत्र में नवीकरणीय ही एकमात्र भविष्योन्मुख रास्ता है। समस्या सिर्फ संक्रमण काल की है। संक्रमण काल के लिहाज से प्रारंभिक तौर पर लागत, प्रभाव और कार्य कुशलता के मुद्दे हैं। इसके दो पहलू हैं। पहला तो यह है कि नवीकरणीय ऊर्जा में अगर पर्यावरण संबंधी चिंताओं को शामिल नहीं किया जाए तो यह अपेक्षाकृत महंगी तकनीक है। दूसरा पहलू यह है कि इस तकनीक में सभी जरूरी सवालों का हल भी नहीं मिलता। उदाहरण के तौर पर कुछ औद्योगिक प्रक्रिया में बेहद गर्म उपकऱणों की जरूरत होती है, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा के पास अभी इसका समाधान नहीं है।

हालांकि, दीर्घकालिक हित को ध्यान में रखते हुए भारत को नवीकरणीय उर्जा के विकल्प की ओर प्रस्थान करना होगा और यह काम मौजूदा रफ्तार से ज्यादा तेजी में करना होगा।

वर्ष 1992 में जो साझा लेकिन विलक्षण उत्तरदायित्व (सीबीडीआर) का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था, क्या आपको लगता है कि वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जबकि भारत और चीन जैसे देश कार्बन उत्सर्जन के लिहाज से काफी आगे आ रहे हैं?

रमन मेहता: साझा लेकिन विलक्षण उत्तरदायित्व (सीबीडीआर) का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में आज भी प्रासंगिक है। उदाहरण के तौर पर अगर विकास के पैमानों पर भारत को सूची-एक के दूसरे देशों के बरक्श रख कर परखें तो यह काफी पीछे है। अभी हमें इस सूची के दूसरे देशों के करीब पहुंचने में तीस साल और लगेंगे। सूची-एक के देशों ने अपनी जिम्मेवारियों को पूरा नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है तो इसका एक कारण है कि विकसित देशों ने अपने प्रदूषण में जरूरी कटौती नहीं की है। उधर, विकासशील देशों के तेज विकास ने भी उत्सर्जन को बढ़ाया है।

सीबीडीआर सिद्धांत को लागू करने के लिए इसकी दोहरी परिभाषा को बदलना होगा। लेकिन यह भी समझना होगा कि भारत और चीन जैसे देश और अमेरिका व यूरोपीय संघ के देशों के बीच समानता तो नहीं हो सकती। इसलिए दोनों के बीच विभेद तो करना ही होगा। इससे भी ज्यादा जरूरी है कि सूची-एक के देश इस बात को समझें कि भारत जैसे बड़े विकासशील देसों के लिए विकास की जिम्मेवारी भी पूरी करनी जरूरी है। इन देशों को अपने लोंगों की गरीबी दूर कर उन्हें समृद्ध भी बनाना है।

भारत जैसा देश, जहां 29 अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले राज्य हैं। एक तरफ लाहौल और स्पीति जैसे शीत क्षेत्र हैं तो दूसरी तरफ पश्चमी घाट जैसे भारी जैव विविधता वाले क्षेत्र हैं। जलवायु परिवर्तन को ले कर नीति बनाते समय इस विविधता के लिहाज से किन बातों का ध्यान रखने की जरूरत है?

रमन मेहता: जलवायु परिवर्तन के अलग-अलग प्रभावों का आकलन करने और उसके मुताबिक उससे जूझने के उपाय करने के लिहाज से कुछ खास बातों का ध्यान रखने की जरूरत है। सबसे पहली जरूरत तो इस बात की है कि स्थानीय समुदायों को इतना सक्षम बनाया जाए कि वे इस प्रभाव का सामना कर सकें। इसी तरह देश में विकास संबंधी फैसले जिस तरह लिए जा रहे हैं, उसमें भी व्यापक बदलाव लाना होगा। इस लिहाज से हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भविष्य में हमें किन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

मध्य प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के बारे में आप क्या कहेंगे? इसमें तय की गई नीतियों को राज्य सरकार प्रभावशाली तरीके से कैसे लागू कर सकती है?

रमन मेहता: मध्य प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (एमपीएपीसीसी) भारत में सबसे पहले तय की गई योजनाओं में से है। राज्य के लिए यह एक शानदार शुरुआत मानी जा सकती है। इसमें खास तौर पर दो-तीन बातों पर जोर दिया जाना उचित होगा। समय के साथ ही जलवायु परिवर्तन के खतरे भी स्पष्ट होते जा रहे हैं, इसलिए योजना की भी नियमित तौर पर समीक्षा करने की जरूरत है। इस समीक्षा को नियमित प्रक्रिया में शामिल करना होगा। एमपीएपीसीसी के क्रियान्वयन को ज्यादा सुस्पष्ट बनाना होगा। इस काम के लिए नए संस्थानों को शामिल करना होगा और इन संस्थानों को ज्यादा मानव संसाधन और वित्तीय संसाधनों से युक्त करना होगा। तभी ये राज्य कार्य योजना को वास्तव में साकार कर पाएंगे।

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया