बाघों की संख्या और उनकी शरणस्थली पर ध्यान देना जरूरी : दीपांकर घोष

दीपांकर घोष
Mr Dipankar Ghose
द्वारा प्रकाशित-अक्टूबर 28, 2014
विषय-वस्तु: वानिकी

जैव विविधता की रक्षा में आपके मुताबिक हमारे पड़ोसी देशों का कितना महत्व है ?

दीपांकर घोष: पूर्वी हिमालय के परिदृष्य को ध्यान में रखते हुए नेपाल और भूटान हमारे लिए बेहद अहम हैं। इसी तरह मैनग्रूव और सुंदरबन के लिहाज से बांग्लादेश का बहुत महत्व है। हम बाघ के मामले में पहले ही सीमा पार निगरानी शुरू कर चुके हैं। भूटान और नेपाल दोनों देशों के साथ हम यह कर चुके हैं। पड़ोसी देश का महत्व इस लिहाज से भी है कि हमें बाघ संरक्षण के लिए उनके अभयारण्य में सीमा पार भी वही प्रबंधन व्यवस्था करनी होगी जो हमारी सीमा में उपलब्ध है। वर्ना क्या होगा कि अगर कोई बाघ भारत से सीमा पार कर जाता है तो वह दूसरे देश की सीमा में मारा जा सकता है। इसलिए हमारे लिए यह बहुत अहम है कि संबंधित अभयारण्य में सीमा पार भी उसके लिए पर्याप्त इंतजाम हों।

भारत-नेपाल सीमा-पार बाघ सर्वेक्षण की मुख्य बातें क्या हैं ?

दीपांकर घोष:  यह रिपोर्ट दोनों देशों में बाघों की साझा गिनती के बारे में ज्यादा जोर देती है। बाघ के लिए ना तो कोई भारत है और ना ही नेपाल। उनके लिए बस अपना इलाका है। रिपोर्ट बताती है कि वे इधर-उधर जा रहे हैं। इन रिपोर्ट का फायदा उन गलियारों की पहचान में मदद करता है जिनको जानवरों के लिहाज से सुरक्षित करना है। यह रिपोर्ट उन इलाकों की भी पहचान करती है, जहां सड़कों और दूसरे ढांचागत सुविधाओं के विकास की वजह से उनकी आवाजाही अवरुद्ध हुई है। लेकिन इस रिपोर्ट में सबसे सकारात्मक बात यह पता चलती है कि बाघ इन गलियारों में आ-जा रहे हैं।

भारत में बाघ के संरक्षण के लिहाज से भारत-नेपाल सीमा-पार सर्वेक्षण का क्या महत्व होगा?

दीपांकर घोष: इस तरह के सर्वेक्षण काफी महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि बाघ की आवाजाही और स्थान विशेष पर उनकी गिनती को जान कर ही हम यह जान सकेंगे कि उनको किन गलियारों में क्या जरूरत है। साथ ही इससे सुरक्षित जंगलों में उन्हें किस तरह की सुरक्षा की जरूरत है, इसका भी पता चलता है।

वर्ष 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक ने बाघ की संख्या के मामले में मध्य प्रदेश को पीछे छोड़ दिया है। मध्य प्रदेश सरकार को अपना नंबर एक स्थान बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए ?

दीपांकर घोष: बाघों की जनसंख्या के मामले में हमें राज्यवार आकलन नहीं करना चाहिए। उनकी गिनती गलियारों के लिहाज से होनी चाहिए। मध्य प्रदेश के मामले में हम कह सकते हैं कि इसके गलियारों में जो निगरानी की गई है, उसके मुताबिक स्पष्ट है कि यहां सतपुरा मैकल और कान्हा अचानकमार गलियारों में बाघों की आवजाही हो रही है। मध्य प्रदेश सरकार ना सिर्फ सुरक्षित क्षेत्र में बाघों की सुरक्षा का इंतजाम कर रही है, बल्कि संरक्षित वन क्षेत्र और उनके विचरण के रास्तों में भी उनकी सुरक्षा का इंतजाम कर रही है। हम राज्य के वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से भी नियमित संपर्क में हैं। अगर उनके गलियारे और उनमें उनकी आवजाही पूरी तरह स्थापित कर दी गई तो मुझे पूरा विश्वास है कि मध्य प्रदेश को ज्यादा संख्या में बाघ मिल सकेंगे या कह सकते हैं कि यहां बाघों की ज्यादा आवाजाही हो जाएगी।

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया