जलवायु परिवर्तन के संकेत काफी स्पष्ट हो चुके हैं : राजेंद्र सिंह, अध्यक्ष, तरुण भारत संघ

राजेंद्र सिंह
द्वारा प्रकाशित-जनवरी 12, 2015
विषय-वस्तु: पर्यावरण, जल

जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन को ले कर राजस्थान में किए गए आपके काम के बारे में सभी जानते हैं। मध्य प्रदेश में आप किस तरह से सक्रिय हैं?  

राजेंद्र सिंह: इस समय हम मध्य प्रदेश के 10-11 जिलों में जल संरक्षण के प्रति जागरुकता लाने में जुटे हैं। इस लिहाज से हमने वर्ष 2013 में ‘जल-जन जोड़ो अभियान’ शुरू किया है। मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में हम नीलेश देसाई, संजय सिंह और भगवान सिंह परमार जैसे लोगों के जन संगठनों के साथ हाथ मिला कर काम कर रहे हैं।

इससे पहले लगभग 11 साल पूर्व हमने टीकमगढ़ जिले में एक जल स्रोत को पुनर्जीवित किया था। नदियों की सफाई के लिए मैं राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान से कई बार मिल चुका हूं। राज्य की नदियों की स्वच्छता के लिए बनाई गई सलाहकार समिति का मैं सदस्य रहा हूं। राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी राजस्थान के अलवर में आ कर हमारे काम को देखा है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिहाज से मध्य प्रदेश में वास्तव में काफी माहौल बना है, जिसे जारी रखने की जरूरत है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के मामले में कम से कम यह राज्य तो दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर कर रहा है।

कई लोग अब भी मानने को तैयार नहीं कि जलवायु परिवर्तन का खतरा हमारे बिल्कुल पास आ चुका है। क्या आपको लगता है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है?

राजेंद्र सिंह: जो लोग जलवायु परिवर्तन को मिथ्या बता रहे हैं, उनका जरूर कोई छुपा हुआ एजेंडा है। आपको समझना होगा कि अगर पहाड़ों में लगातार इस तरह की बाढ़ आ रही है जैसी कि पहले 2013 में उत्तराखंड में आई और फिर 2014 में जम्मू-कश्मीर में, तो यह निश्चित ही किसी ओर इशारा कर रही है। मुझे लगता है कि यह स्पष्ट तौर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है और हम इसे होते हुए देख सकते हैं। बादल फटना, बेमौसम बरसात, ग्लेसियर का पिघलना, समुद्र तल का ऊपर होना... ये सब जलवायु परिवर्तन के ही तो संकेत हैं।

क्या जलवायु परिवर्तन के खतरे से आम लोग सजग हैं? इस बारे में उनकी क्या प्रतिक्रिया रहती है?

राजेंद्र सिंह: गांवों के लोग जलवायु परिवर्तन से अच्छी तरह वाकिफ हैं। इसे वे अपने शब्दों और तरीके से व्यक्त करते हैं। वे इसे ‘धरती का बुखार’ कहते हैं। वे कहते हैं कि ‘मौसम का मिजाज बिगड़ गया’ है। किसान कहते हैं कि धरती के बुखार का इलाज हरियाली से होता है। इसी तरह वे कहते हैं कि हवा में जहरीली गैसें भर गई हैं और इसे भी हरियाली से ही दूर किया जा सकता है। गांव के लोग यह भी कहते हैं कि अगर हरियाली बढ़ाई नहीं गई तो लोग बीमार पड़ेंगे।

आम लोग जिस तरह जलवायु परिवर्तन के बारे में बताते हैं, वह तरीका अलग होता है। वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री इस जमीनी भाषा को समझ नहीं पाते। पढ़े-लिखे लोग ना सिर्फ इस भाषा को नजरअंदाज करते हैं, बल्कि उनकी भावना को भी उपेक्षित करते हैं।

पर्यावरण बनाम विकास को ले कर एक बड़ी बहस जारी है। इस बारे में आप क्या कहेंगे?

राजेंद्र सिंह: वास्तविकता तो यह है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण विकास से ही जुड़ा हुआ है। अगर हम इस संरक्षण नहीं करेंगे तो जो विकास हम हासिल करेंगे, उसे बनाए नहीं रख पाएंगे। जिस तरह से हम अपने वनों का प्रबंधन कर रहे हैं, वह ना तो वन के लिए अच्छा है और ना ही हमारे साझा भविष्य के लिए। जिस तरह के विकास में हम लगे हैं, उससे धरती दिन-ब-दिन बदतर बनती जा रही है।

- वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया