जलवायु परिवर्तन का विज्ञान गहन और विश्वसनीय है: डॉ. दुभाष

डॉ. दुभाष
Navroz K. Dubash
द्वारा प्रकाशित-जुलाई 12, 2014
विषय-वस्तु: पर्यावरण

जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक घटना है. क्या आप मानते हैं कि इस विषय में विभिन्न देशों के बीच वैश्विक ताप वृद्धि को रोकने के लिए कोई पर्याप्त वैश्विक सहमति बन चुकी है ?

डॉ. दुभाष: जलवायु परिवर्तन का विज्ञान एक भरोसेमंद विज्ञान है, जैसा कि आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप-एक की रिपोर्ट बताती है. हालाँकि जलवायु परिवर्तन की समस्या एक सामूहिक प्रयास की मांग करती है, फिर भी कई देशों में इसके प्रभावी निराकरण के सम्बन्ध में अलग-अलग नजरिये हैं. यह मत-विभिन्नता बहुत स्पष्ट रूप से जाहिर होती है. खासकर संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संगठनों के आलावा अन्य संगठनों के प्रयासों में, जहां कई मुद्दों पर नीतिगत विभाजन देखने को मिलते हैं. ये विभाजन जहां स्पष्ट नज़र आते हैं वे हैं - घरेलु और स्थानीय मुद्दों पर स्वैच्छिक रणनीतियां, द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते और इन्ही के साथ-साथ निजी क्षेत्र के या अंतरदेशीय प्रयास. अधिकाँश देशों में एक बात पर जो सहमति बनती है वो ये है कि वर्तमान में वातावरण में जो कार्बन डाई आक्साइड मौजूद है, वो निर्विवाद रूप से औद्योगिक या विकसित देशों के द्वारा छोड़ी गयी है (हालाँकि अब चीन जैसे देश का योगदान भी इसमें बढ़ रहा है), और कार्बन उत्सर्जन कम करने के किसी भी प्रयास का बुरा परिणाम विकासशील देशों को भुगतना पड़ेगा. इससे उनके आर्थिक विकास की गति पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.

इस बात पर भी सहमति का अभाव है कि शीर्ष स्तर से अंतर्राष्ट्रीय बाधक समझौते लागू किये जाएँ, या जमीनी स्तर के घरेलु उपायों को वरीयता दी जाए. हालाँकि नवीनतम आईपीसीसी रिपोर्ट यह बतलाती है कि आम तौर पर कानकुन सम्मलेन से जाहिर हुई सहमति को ध्यान में रखें तो यह संभव नहीं लगता कि आगामी वर्षों में तापमान को दो डिग्री सेल्सियस की सीमा के अन्दर रखा जा सकेगा.  

भारत में हमारे पास एक सु-परिभाषित पर्यावरण नीति है, उसके बावजूद हमारा पर्यावरण बिगड़ रहा है. ऐसे में हम किस प्रकार अपने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और पर्यावरण का संरक्षण करें?

डॉ. दुभाष: हमारे पास पर्यावरण संबंधी क़ानून (१९७०) है, और देश में एक सक्रिय न्यायपालिका है जो पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण, एवं पर्यावरण संबंधी अधिकारों पर उल्लेखनीय फैसले देती आयी है. इसके बावजूद भी पर्यावरणीय मानकों पर हम पिछड़ते जा रहे हैं, और हमारा पर्यावरण बिगड़ता जा रहा है. इसके तीन प्रमुख कारण हैं. पहला, पर्यावरण के क़ानून व्यावहारिक क्रियान्वयन की कठिनाइयों को ध्यान में रखकर नहीं लिखे गये हैं. दूसरा, इस कारण क़ानून का पालन ठीक से नहीं हो पाता, संस्थाओं की क्षमता पर्याप्त विकसित नहीं है, साथ ही राजनैतिक इच्छा शक्ति का भी अभाव है. तीसरा, वर्तमान क़ानून व्यवस्था तंत्र का कोई भय नहीं है, वो शायद इसलिए कि निगरानी का हमारे पास कोई तरीका नहीं है और दंडात्मक कार्यवाही का भी अभाव है. 

यह भी गौर करने लायक है कि प्राकृतिक संसाधनों के सम्बन्ध में निर्णय निर्माण की प्रक्रिया में बहुत सारे प्रासंगिक मुद्दे शामिल होने चाहिए, जैसे कि सामाजिक कारक, बेहतर ढंग से आंकड़ों का विश्लेषण, पारदर्शिता, व्यक्तिगत उत्तरदायित्व और जवाबदेही तय करना इत्यादी. भारत को अभी भी अच्छी प्रक्रियाओं को स्थापित करना और ऐसे आवश्यक तंत्रों की स्थापना करना बाकी है, जो कि ये सुनिश्चित कर सकें कि पर्यावरण को कम से कम हानि हो. साथ ही जो ये भी सुनिश्चित कर सकें कि विकास की प्रक्रियाओं का दूरगामी प्रभाव समाज और पर्यावरण की सुरक्षा पर ना पड़े.

आपको क्यों लगता है कि भारत जलवायु परिवर्तन के मामले में विशेष रूप से संवेदनशील या सुभेद्य है? और ये भारत की खाद्य सुरक्षा को किस तरह प्रभावित करेगा?

डॉ. दुभाष: यूएनऍफ़सीसीसी के साथ भारत का जो द्वितीय राष्ट्रीय संवाद हुआ है, उसमे उल्लेख है कि “भारत में बहुत विविधतापूर्ण स्थालाक्रतियाँ, जलवायु और जैवमंडल है” साथ ही दुनिया की १८ प्रतिशत आबादी भारत में रहती है. आईपीसीसी की नवीनतम व पांचवी रिपोर्ट कहती है, कि भारत में औसत मौसमी बारिश में कमी आयी है, लेकिन साथ ही पिछले तीन दशकों में तीव्र और अनियमित बारिश बढी है. भविष्य में औसत बारिश और तीव्र बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी की संभावना है जिससे बाढ़ की संभावना बढ़ने लगेगी. रिपोर्ट यह भी बताती है, कि भारत में अनाज का कटोरा कहे जाने वाले गंगा के मैदानों में गेंहू की पैदावार में भारी कमी आएगी. वहीं रिपोर्ट ये भी बताती है कि देश का बड़ा भूभाग जो कि आधारभूत संरचना और जननांकिकीय विकास में पिछड़ा हुआ है, वह जलवायु परिवर्तन के लिए सर्वाधिक सुभेद्य है. इस कारण प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता बढ़ जायेगी. 

खाद्य सुरक्षा भारत के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है, क्योंकि यहाँ की सत्तर प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि और संबधित कार्यों पर निर्भर है. इसके बावजूद भी कृषि का योगदान सकल घरेलू उत्पाद में बहुत कम है और यह घटता ही जा रहा है. सुभेद्यता और जोखिम के सन्दर्भ में इससे ये चिंता और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन की सीधी मार तापमान और बारिश की प्रवृत्तियों पर पड़ेगी जिससे पानी की उपलब्धता, फसलों की पैदावार और दूरगामी उत्पादकता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. इस कारण पहले से ही संकट में पड़े क्षेत्रों पर और अधिक दबाव पड़ेगा.

घटी हुए उत्पादकता छोटे किसानों की कृषि व गैर-कृषि संबंधी आर्थिक प्रक्रियाओं से संपत्ति निर्माण पर बुरा असर डालेगा. इससे बुनियादी ढाँचे पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और सम्मिलित रूप से इसका प्रभाव ये होगा कि लोग मौसमी अनियमितताओं के प्रति अधिक सुभेद्य हो जायेंगे. पहले से ही हमारे घरेलू अन्न उत्पादन और वितरण में गंभीर असंगतियाँ हैं, जलवायु परिवर्तनशीलता इस स्थिति को और अधिक बिगाड़ देगी और देश की खाद्य सुरक्षा पर इसका बुरा असर पड़ेगा.

मध्य प्रदेश सहित भारत के कई इलाके जलवायु परिवर्तनशीलता के कारण लगातार सूखे और बाढ़ का सामना कर रहे हैं. इससे इंसानी आबादी और वन्यजीवन दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है. इसके मद्देनजर, मध्यप्रदेश जैसे संपन्न राज्य को क्या करना चाहिए जिससे कि यहाँ की जनसंख्या को जलवायु परिवर्तन खतरों से बचाया जा सके?

डॉ. दुभाष: इस दिशा में मध्य प्रदेश के लिए जलवायु परिवर्तन कार्य योजना और जिलेवार सुभेद्यता आकलन को पहला महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है. लेकिन इन कदमों को भविष्य की आवश्यकता के अनुसार सुधारे जाने की आवश्यकता है.

जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर हमारे अध्ययन और मूल्यांकन पर आधारित कुछ सुझाव इस प्रकार नोट किये जा सकते हैं. और इन्हें state-climate-plans.cprindia.org से डाउनलोड किया जा सकता है.

  1. योजनाओं को स्वयं में योजना निर्माण की प्रक्रिया से अवगत बनाए रखने की आवश्यकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध में लोचशीलता (अनुकूलन और शमन) टिकाऊ विकास की आधारभूत संकल्पनाओं का विस्तार करते हुए उन्हें आपस में जोड़ा जा सके. यह इसलिए भी आवश्यक है कि केंद्र, राज्य और वित्तप्रदाताओं में यथास्थिति बनाए रखने की मानसिकता से बचा जा सके. 
  2. मध्यप्रदेश में सुभेद्यता आकलन और राज्य कार्य योजना दो अलग-अलग परियोजनाओं से सम्बद्ध रही हैं, और क्योंकि इनमे से प्रथम की समय सीमाएं भिन्न रही है इसलिए यह राज्य कार्य योजना की अनुशंसाओं में अपना योगदान नहीं दे सकी है. आने वाले समय के लिए राज्य कार्य योजना सुभेद्यता आकलन के परिणामों के आधार पर निर्मित की जा सकती है.
  3. विज्ञानसम्मत और जमीनी अनुमान, जो कि राज्य की जलवायु परिवर्तन संबंधी वास्तविकताओं से जुड़े हो, उन्हें आसानी से राज्यों के लिए उपलब्ध करवाया जाना चाहिए. इस कार्य में केंद्र एक बड़ी भूमिका निभा सकता है.
  4. राज्य के योजना निर्माण प्रक्रियाओं में शमन को आवश्यक रूप से शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि टिकाऊ विकास और अनुकूलन व शमन तार्किक रूप से आपस में जुड़े हुए हैं. साथ ही चूंकि ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े प्रयासों में भी राज्यों की रूचि है, इसलिए ये कदम आवश्यक हैं.
  5. तात्कालिक उपायों के सन्दर्भ एवं विभागों के बीच में बेहतर समझ और सृजनात्मकता की आवश्यकता है. इसके लिए आंतरिक प्रक्रियाओं में योग्य प्राथमिकताओं को पहचानने और तय करने की जरूरत है. साथ ही विभिन्न विभागों के बीच बेहतर संवाद बनाना भी जरुरी है.
  6. नए विचारों और उपायों के सृजन के लिए सभी हितधारकों के साथ मंत्रणा को बढ़ावा दिया जाए और योजना निर्माण के हर चरण पर इसका पालन किया जाए.
  7. मध्यप्रदेश विभिन्न इलाकों में की गयी क्षेत्रीय मंत्रणा-कार्यशालाओं से प्राप्त परिणामों को बेहतर ढंग से आपस में जोड़ा जा सकता था और बेहतर सुझाव भी दिए जा सकते थे.
  8. विभिन्न विभागों और हितधारकों के बीच बेहतर और अन्तः क्रियात्मक सम्बन्ध बनाए रखने के लिए वित्तप्रदाता एजेंसियों के हस्तक्षेप का उपयोग किया जा सकता है. आरंभक कार्यशालाएं और अध्ययन ऐसे होने चाहिए ताकि उनसे नए विचारों और मुद्दों के सृजन में रुकावट ना आये.
  9. जलवायु नियोजन के लिए पर्याप्त समय दिए जाने की आवश्यकता है, कम समय सीमा के कारण सृजनात्मक कार्य कठिन हो जाता है और सारे प्रयास पुनः पुराने ढर्रे पर लौट आने का भय रहता है.

क्या आपको लगता है भारत जलवायु परिवर्तन के खतरों को पहले से ही झेल रहा है? क्या हमारे पास इतने सबूत हैं जिनसे हम कह सकें कि कुछ बदलाव निश्चित रूप से जलवायु परिवर्तन से हो रहे हैं ?

डॉ. दुभाष: जैसा कि पहले कहा जा चुका है, आईपीसीसी के अनुसार भारत में औसत मौसमी बारिश कम हो रही है लेकिन तीव्र और अनियमित बारिश में बढ़ोतरी हो रही है. साथ ही उच्च तापमान की घटनाओं में पिछली आधी सदी में बढ़ोतरी हुई है. कुछ अर्ध शुष्क इलाकों में पिछले सौ सालों के अध्ययन बताते हैं कि सूखे की घटनाएं बड़ी हैं. इसी के साथ तापमान में वृद्धि के कारण देश के सेब बेल्ट में भी उंचाई की तरफ विस्थापन हो रहा है. कई अनुमान व मान्यता  आधारित अध्ययन भी जलवायु परिवर्तनशीलता संबंधी स्थानीय घटनाओं को उजागर करती हैं. हालाँकि कोई एक घटना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं मानी जा सकती लेकिन कई लोगों के इकट्ठे प्रेक्षण और लम्बे समय में मौसम में आरहे तीव्र बदलाव की जानकारी के आधार पर जलवायु परिवर्तन के समर्थन में आवश्यक प्रमाण मिलते हैं.

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया