गरीबी उन्मूलन को मुश्किल बनाएगा जलवायु परिवर्तन: सुनीता नारायण

सुनीता नारायण
Sunita Narain
द्वारा प्रकाशित-दिसंबर 31, 2014
विषय-वस्तु: पर्यावरण

 

यूं तो अब तक भोपाल त्रासदी का भी पूरी तरह पटाक्षेप नहीं हो सका है, मगर इस घटना के बाद से अब तक हमने ऐसे हादसों से बचने के उपायों के लिहाज से क्या किया है?

सुनीता नारायण: भोपाल त्रासदी के उपरांत कई कानूनी प्रावधान सामने आए थे, लेकिन उनके अमल को ले कर समस्या अब भी कायम है। इस हादसे के बाद पहला प्रमुख कानून बना वर्ष 1986 में और वह था पर्यावरण (सुरक्षा) कानून (ईपीए)। 1987 में फैक्ट्री कानून में संशोधन किए गए। इसी तरह वर्ष 1989 तक खतरनाक अपशिष्ट (प्रबंधन और निपटान) नियम बन गए। 1991 में खतरनाक कचरे के प्रबंधन के दौरान दुर्घटना का शिकार हो जाने वाले लोगों को तत्काल राहत देने के लिए लोक उत्तरदायित्व बीमा कानून तैयार किया गया।

यह तो सच है कि हम भोपाल त्रासदी जैसे हादसे को दुबारा होने से रोक पाए हैं, लेकिन मिनी-भोपाल कांड तो लगातार हो रहे हैं। नियमित हो रहे औद्योगिक हादसों में सालाना हजारों कर्मी घायल हो रहे हैं। बहुत से मामले तो सामने भी नहीं आ पाते। इसी तरह भूमि और जल के प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। हजारों टन खतरनाक कचरा देश भर में विभिन्न जगहों पर फैला पड़ा है।
इन कानूनों और नियमों को अमल में लाने की प्रक्रिया को मजबूत करने की जरूरत है। इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना होगा और साथ ही उल्लंघन पर जुर्माना भी बढ़ाना होगा। स्थानीय लोगों की प्रशासन में भागीदारी बढ़ानी होगी। यह काम पारदर्शी लोक सुनवाई और लोगों में जागरुकता ला कर ही किया जा सकता है। हमें कारपोरेट उत्तरदायित्व की व्यवस्था को भी मजबूत बनाना होगा।

पर्यावरण संबंधी व्यापक कार्यक्रमों को प्रभावी रूप देने के लिहाज से तो हम अभी काफी पीछे हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने की दिशा में भारत की मौजूदा दिशा और गति को ले कर आपकी क्या राय है?

सुनीता नारायण : इंटर गवर्मेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया को बुरी तरह प्रभावित करने वाला है और इसका खतरा बढ़ता ही जा रहा है। इस वजह से दुनिया भर के गरीबों की जिंदगी सबसे ज्यादा मुश्किल में पड़ने वाली है। भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर चिंताजनक है, क्योंकि दुनिया भर के 33% गरीब यहीं बसते हैं।

यूके की अंतरराष्ट्रीय आपदा सलाहकार संस्था मैपलक्रोफ्ट की ओर से प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के 194 देशों में जिन देशों पर यह खतरा सबसे ज्यादा है, उनमें भारत 13वें स्थान पर है। बाढ़, सूखे, तूफान, शीतलहर और लू के थपेड़े भारत पर लंबे समय से पड़ते रहे हैं और ये देश की प्राकृतिक जलवायु का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन देश के विभिन्न भाग इनसे निपटने के लिए समान रूप से तैयार नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर देगा और गरीबी उन्मूलन को और मुश्किल बना देगा। इसी तरह यह खाद्य संरक्षा को मुश्किल बना कर गरीबी के मौजूदा जाल को मजबूत बनाएगा और साथ में नए फंदे भी तैयार करेगा।

भारत ने जून, 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) तैयार की थी, जिसमें आठ मिशन की पहचान की गई थी और साथ ही उत्सर्जन घटाने व अनकूलन के लिहाज से जरूरी कार्यक्रमों व नीतियों की पहचान की गई थी।

हाल में पुनर्गठित जलवायु परिवर्तन कार्यकारी समिति (ईसीसीसी) की ओर से आठ राष्ट्रीय मिशनों की नवीनतम समीक्षा में पाया गया है कि इन मिशनों को प्रभावी बनाने के लिए बेहतर प्रयास की जरूरत है।

एनएपीसीसी के तहत कई और उपाय भी तय किए गए थे। इनमें बिजली उत्पादन में पैदा होने वाली जहरीली औद्योगिक गैसों (जीएचजी) को कम करने, अन्य नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक (आरईटी) कार्यक्रम, आपदा प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों की रक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन के संबंध में सरकार के विभिन्न स्तरों पर नीतियों का निर्माण आदि शामिल हैं। लेकिन इन सभी में अब तक के प्रयास काफी धीमे हैं और कार्यकारी समिति ने सुझाव दिया है कि संबंधित मंत्रालय इस पर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयोजन में जल्दी से जल्दी कार्य योजना तैयार करें।

सवाल यह है कि क्या भारत जलवायु परिवर्तन की चुनौती स्वीकार करने और इससे जूझने के उपाय करने को तैयार है। जवाब है नहीं। अगर हम मौजूद रफ्तार से चलते रहे तो हमारे लिए चुनौती का समना करना काफी मुश्किल होगा। जलवायु परिवर्तन पर कारगर कदम उठाने में लेट-लतीफी भारत के लिए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की तरह होगी।

जलवायु परिवर्तन को ले कर अगले एक साल के दौरान भारत में कैसी स्थिति बनती देख रही हैं, खास तौर पर भावी राष्ट्रीय सुनिश्चित सहयोग (आईएनडीसी) को ले कर?

सुनीता नारायण: सरकार के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह स्पष्ट करे कि वह अपने कार्बन बजट में भागीदारी को कैसे सुनिश्चित करेगा। जलवायु परिवर्तन जैसी अंतरराष्ट्रीय समस्या से निपटने के लिए तैयार होने वाली किसी भी प्रक्रिया में भागीदारी का सिद्धांत अंतर्निहित होना ही चाहिए। वर्ष 1990 से ही सीएसई कहता रहा है कि जलवायु दुनिया की साझा नेमत है और इसलिए हमें इसके बोझ को भी साझा तौर पर ही वहन करना है। आज हम इस स्थिति में हैं तो इसका एक कारण विकसित देश हैं, जिन्होंने अपने यहां औद्योगीकरण की रफ्तार को बनाए रखने के उपक्रम में अपना उत्सर्जन कम नहीं किया। लेकिन इसके साथ ही दुनिया के बाकी देशों ने भी खुद को इस संघर्ष में बनाए रखने की जद्दोजहद में उत्सर्जन की रफ्तार बनाए रखी। ऐसे में सभी देशों के लिए बेहद जरूरी है कि वे न्यूनतम कार्बन विकास योजना पर चलें।

अब भारत के लिए जरूरी है कि वह अपना उत्सर्जन लक्ष्य या उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य तय करे। इस क्रम में इसे अपनी क्षमता और विकसित देशों की ओर से निर्धारित मानकों का खयाल रखना होगा। साझा लेकिन भिन्न उत्तरदायित्व (सीबीडीआर-आरसी) के लिहाज से ये कदम बेहद जरूरी हैं। बाकी बातें बेमतलब हैं।

भारत में जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में विभिन्न राज्यों की स्थिति में बहुत फर्क है। उदाहरण के तौर पर गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में सिरमौर हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र,

केरल और मध्य प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के लिहाज से उत्सर्जन घटाने के लिए कई नीतियां हैं। ऐसे में इस तरह के जो विभिन्न उदाहदरण देश के अलग-अलग राज्यों में उपलब्ध हैं, उन्हें सभी राज्यों में साझा करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

सुनीता नारायण- इस बात से सभी सहमत हैं कि जलवायु परिवर्तन के लिहाज से भारत के विभिन्न राज्य अलग-अलग रफ्तार से चल रहे हैं। केंद्र ने सभी राज्यों को जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजना (एसएपीसीसी) तैयार करने को कहा था। लेकिन नवंबर, 2014 तक 22 राज्यों ने अपनी कार्य योजना पेश की, इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया है। महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे कई बड़े राज्यों की कार्य योजना अब तक तैयार नहीं हुई है। ईसीसीसी ने अपनी ताजा बैठक में अनुरोध किया है कि एसएपीसीसी को तैयार करने में और विलंब नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही इसने कहा है कि अगर जरूरत हो तो इसमें बताए गए कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने के लिए एक नई केंद्र पोषित योजना (सीएसएस) भी लाई जाए। यह भी  सच है कि जिन राज्यों ने एसएपीसीसी तैयार कर लिया है और उसे मंजूरी मिल गई है, उन्हें भी इसे लागू करने में बहुत सी मुश्किलें आ रही हैं। राज्य कार्य योजना को अमल में लाने में आ रही चुनौतियों और अनुकूलन के लिहाज से बढ़ते खर्च को देखते हुए सरकार को जलवायु परिवर्तन संबंधी अपनी रणनीति को ले कर पुनर्विचार की सख्त जरूरत है। अब तक उत्सर्जन घटाने के लिए कोई विशेष राष्ट्रीय कार्यक्रम मौजूद नहीं है। वर्ष 2014 में पहली बार राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन कोष गठित करने की घोषणा की गई, लेकिन अब तक इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है कि इस कोष का मुख्य ध्येय क्या होगा और इसे किस तरह काम में लाया जाएगा।

विभिन्न राज्यों और खास तौर पर जिन राज्यों में जलवायु परिवर्तन संबंधी चुनौतियां एक समान हैं, उन्हें एक साथ लाना होगा। उदाहरण के तौर पर जलवायु परिवर्तन संबंधी अनुकूलन प्रयास को ले कर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चिंताएं एक जैसी हैं। राज्य और केंद्र सरकार की ओर से विशेष प्रयास कर विभिन्न राज्यों के बीच ज्यादा नियमित संवाद कायम करने की जरूरत है। अब तक कई राज्यों में जलवायु संबंधी शोध, आंकड़े व साक्ष्य इकट्ठा करने के लिहाज से राज्य स्तर पर कोई पहल ही नहीं हुई है। जलवायु परिवर्तन पर स्थानीय समुदाय का क्या मत है, इस संबंधी प्रयासों में उनकी भागीदारी की क्या स्थिती है, इन तथ्यों को दर्ज करने की कोशिश नहीं हो रही। विभिन्न राज्यों में जलवायु संबंधी व्यापक खतरों और विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव का सटीक आकलन उपलब्ध नहीं है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि विभन्न राज्यों के एसएपीसीसी में कई खामियां हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है।

अंत में, आपको पेरिस में 2015 में होने वाले समझौते के लिहाज से लीमा में वांछित जलवायु परिवर्तन मसौदे के तैयार होने की कितनी संभावना नजर आती है?

सुनीता नारायण: उम्मीद की जा रही है कि पेरू में विभिन्न देश अपने उत्सर्जन लक्ष्यों, उत्सर्जन तीव्रता या ऊर्जा और वानिकी जैसे विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित अपने लक्ष्यों की घोषणा करेंगे। सभी देशों को कहा गया है कि वे मार्च, 2015 तक अपने भावी राष्ट्रीय सुनिश्चित सहयोग (आईएनडीसी) का मसौदा तैयार कर लें। क्योटो समझौता जहां शीर्ष से नीचे की ओर लागू करने के सिद्धांत पर बना था, मौजूदा चर्चा नीचे से ऊपर की ओर बढ़ने के सिद्धांत पर चल रही है। इसके तहत विभिन्न देशों को अपने राष्ट्रीय सुनिश्चित सहयोग (एनडीसी) तय करने हैं और इन्हें फिर आपस में जोड़ कर अंतरराष्ट्रीय कार्य योजना का रूप दिया जाएगा।

लेकिन जो सबसे बड़े प्रदूषक देश हैं, वे तेल, गैस और कोयला लॉबी के सामने बुरी तरह नतमस्तक दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और चीन ने हाल में जो समझौते का एलान किया है, उसमें कहा गया है कि अमेरिका वर्ष 2025 तक अपने उत्सर्जन को वर्ष 2005 के मुकाबले 26-28% तक घटा लेगा। अब अगर इसे गौर से देखें तो यह आंकड़ों का एक बढ़िया भ्रमजाल है। अगर आप अमेरिका के बयान की ठीक से व्याख्या करें तो पता चलेगा कि वह 1990 की तुलना में 2020 तक महज 3% कटौती करेगा और 2025 तक महज 12-14 फीसदी। उधर, चीन अपने यहां वर्ष 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को अधिकतम स्तर तक पहुंचाएगा और उसके बाद इसमें कटौती शुरू करेगा। साथ ही चीन इस बात के लिए भी सहमत हो गया है कि वह वर्ष 2030 तक अपने यहां गैर फौसिल ईंधन के उपयोग को 20 फीसदी तक पहुंचा देगा। हालांकि इसने अपने लिए कार्बन उत्सर्जन कटौती का कोई खास लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है। एमिसन गैप रिपोर्ट में दिए गए तथ्य बताते हैं कि मौजूदा वादों के दम पर आईपीसीसी की पांचवी रिपोर्ट में दिए गए दो डिग्री सेंटीग्रेट के आंकड़े को छू पाना मुश्किल होगा। ऐसे में हो यह रहा है कि विभिन्न देश वैज्ञानिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने में लग गए हैं। जो वादे किए गए हैं, वे पर्याप्त महत्वाकांक्षी नहीं हैं। यह ऐसी समस्या नहीं है, जिससे निपटने के लिए हम लंबे समय तक इंतजार करते रहें। अंतरराष्ट्रीय भूतल तापमान में दो डिग्री बढ़ोतरी का आंकड़ा नजदीक आता जा रहा है, कार्बन बजट घटता जा रहा है और इसके आवंटन को ले कर आपस में संघर्ष हो रहा है। इस तरह काफी देर हो रही है। जलवायु वित्त पोषण, अनुकूलन, वानिकी और तकनीकी हस्तांतरण जैसे प्रमुख मुद्दों पर विभिन्न देशों का रवैया क्या रहता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा। जब तक विकसित देश इस लिहाज से आगे नहीं बढ़ेंगे, कारगर नतीजे आने की उम्मीद रखना बेमानी होगा।

- वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया