खेती को कीटनाशक और रासायनिक उर्वरक से आजाद करने की जरूरत: देवेन्द्र शर्मा

देवेन्द्र शर्मा
द्वारा प्रकाशित-सितंबर 10, 2014
विषय-वस्तु: कृषि एवं बागवानी

भारतीय किसानों के लिए बेहतर आमदनी कैसे हासिल की जा सकती है ?

श्री शर्मा: मूल्य निर्धारण संबंधी नीतियों का समय अब गुजर चुका है. अब समय है कि आमदनी संबंधी नीतियों पर ध्यान दिया जाए. किसानों की आमदनी उनकी फसल की बाज़ार में कीमत पर निर्भर नहीं होनी चाहिए, हमें ये निर्भरता ख़त्म करनी चाहिए. देश के सवा करोड़ भूखों को भोजन देने का महान बोझ सिर्फ किसानों के ही कंधे पर नहीं होना चाहिए, समाज को भी इस बोझ को बांटना चाहिए. देश में इस समय मंडियों के नेटवर्क को मजबूत करने की आवश्यकता है, जहाँ कि किसानो को अपनी उपज बेचने में आसानी से मंच उपलब्ध हो सके. लेकिन अगर हमने ये काम बाज़ार पर छोड़ दिया तो बहुत बुरे नतीजे आयेंगे.

इसको उदाहरण से समझना चाहिए, मान लो कोई चावल उगाने वाला किसान पंजाब या बिहार से है. पंजाब में मंडियों का बड़ा नेटवर्क है जो सडकों से जुडा हुआ है, किसान यहाँ अपनी उपज बेचने के लिए लाते हैं. पिछली फसल की बात करें तो पंजाब के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य १३१० रुपये प्रति क्विंटल मिला था. लेकिन बिहार में APMC क़ानून नहीं है, इसलिए किसानों को मजबूरन अपनी उपज ९०० रुपये क्विंटल से भी कम दाम में बेचनी पडी.

लागत मूल्य पर कमीशन (CACP) भी अब पंजाब सरकार पर दबाव बढ़ा रहा है कि मंडियों को ख़त्म करके खुले बाजार को अपने ढंग से काम करने दिया जाये, इसका नतीजा ये होगा कि जल्दी ही पंजाब के किसान भी बिहार के किसानों की तरह मुश्किल में पड़ जायेंगे.

मध्यप्रदेश मध्यम वर्षा वाले राज्य से अर्ध शुष्क राज्य बनने की तरफ बढ़ रहा है. अब चूँकि यह देश का दूसरा सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक है, तो इस बात का देश की खाद्य सुरक्षा पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

श्री शर्मा: मुझे कोई वजह नज़र नहीं आती कि बुंदेलखंड क्यों पीपरमेंट फसल की खेती कर रहा है, जबकि ये एक किलो मेंथा तेल के लिए लगभर १.२५ लाख लीटर पानी माँगता है, इसी तरह राजस्थान जैसे अर्धशुष्क इलाके में क्यों ज्यादा पानी मांगने वाला गन्ना, कपास या धान उगाया जा रहा है? मध्यप्रदेश और राजस्थान में हम दालों और मोटे अनाज की खेती क्यों नहीं करते? सरकार क्यों नहीं इस तरह की खेती को बढ़ावा देती ताकि किसान अपनी मर्जी से अधिक टिकाऊ फसलों की तरफ इस बदलाव में शामिल होने लगें?

जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचने के लिए हमारी खेती में किस तरह के बदलाव लाने की जरुरत है?

श्री शर्मा: जलवायु परिवर्तन निश्चित ही खेती के लिए एक बड़ी समस्या बनाने वाला है. लेकिन किसानों के लिए इसका ख़तरा कम करने के बजाये हमारा ध्यान इस बात पर ज्यादा होना चाहिए कि खेती में पैदा होने वाली ग्रीन हाउस गेसों को कैसे कम किया जाए ? यह मानते हुए कि खेती में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन २५ प्रतिशत है जोर इस बात पर होना चाहिए कि खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कैसे कम किया जाए. हमें आन्ध्र प्रदेश में बिना कीट-नाशक और रासायनिक खाद से खेती वाले माडल को सीखना चाहिए और उसके आधार पर खेती के ढंग बनाने और बदलने चाहिए.

देश के सूखे इलाकों में उदाहरण के लिए संकर फसलें उगाई जा रही हैं, इनमे परम्परागत फसलों की तुलना में लगभग दुगना पानी लगता है.  सामान्य बुद्धि हमें बतलाती है कि खेती के लिए बारिश पर आधारित इलाकों में हमने कम पानी मांगने वाली फासले बोनी चाहियें. और ऐसे इलाके पूरे क्षेत्र के लगभग ६५ प्रतिशत भाग में फैले हुए हैं. लेकिन अभी इसका ठीक उलटा हो रहा है जिसके कारण पानी की समस्या बढ़ती जा रही है. 

आपकी दृष्टि में नयी सरकार की प्राथमिकताएं इस दिशा में क्या होनी चाहिए?

श्री शर्मा: भारत की खेती आर्थिक स्थिरता और टिकाऊपन के लिए संघर्ष कर रही है. किसानों की आत्महत्या और खेती बाडी छोड़कर अन्य काम धंधे अपनाने की उनकी ललक, एक भयानक आपदा की तरफ इशारा है. वर्तमान सरकार को किसानों को एक न्यूनतम मासिक आय सुनिश्चित कराने पर ध्यान देना चाहिए. अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट के अनुसार अभी एक किसान की मासिक आमदनी सिर्फ २०१५ रुपये है. इसमें भी ९०० रुपये गैर कृषी गतिविधियों से आता है. लगभग ६० प्रतिशत किसान जीवन यापन के लिए मनरेगा पर निर्भर हैं और लगभग इतने ही रोज भूखे सोते हैं.  

सरकार को “राष्ट्रीय किसान आमदनी कमिशन” का गठन करना चाहिए जो कि किसानों की मासिक आमदनी का हिसाब लगाए. ये हिसाब उस किसान की उपज और उसके खेत की भौगोलिक स्थिति के अनुसार होना चाहिए. इसके आलावा उपज के भंडारण की कमी भी एक समस्या है, सन १०७९ में भोजन बचाओ मुहीम के तहत सरकार ने देशभर में ५० जगहों पर अनाज भण्डार तैयार किये थे. अब वर्तमान सरकार के लिए भी यह कार्य जरुरी हो गया है. वर्तमान सरकार को खेती को कीट-नाशकों से मुक्त करने की मुहीम छेडनी चाहिए आंध्र प्रदेश में लगभग ३५ लाख एकड़ में कीटनाशकों का उपयोग लगभग बंद हो गया है. २० लाख एकड़ में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बंद हो गया है. और इस सबका नतीजा ये हुआ है कि सेहत पर होने वाला खर्चा कम हुआ और किसानों की आमदनी ४५ प्रतिशत बढ़ गयी है.

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया