कदम उठाने में हम जितनी देर करेंगे, यह देरी हमें उतनी ही भारी पड़ेगी: क्रिस्टियाना फिगरेस, यूएनएफसीसीसी

क्रिस्टियाना फिगरेस
Christiana Figueres, Executive Secretary, UN Framework Convention on Climate Change
द्वारा प्रकाशित-दिसंबर 11, 2014

विभिन्न देश अपने उत्सर्जन को घटाने और जलवायु पर खर्च को बढ़ाने का प्रण कर रहे हैं, इस बीच जब आप अगले साल के पेरिस सम्मेलन के लिए समझौते के मसौदे को अंतिम रूप दे रही हैं तो आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी?

क्रिस्टियाना फिगरेस: पेरिस समझौता एक विश्व सम्बन्धी समझौता होगा, सभी देश इसे कामयाब बनाने के लिए सहमत हो चुके हैं।

इसका मतलब है कि वर्ष 2015 की पहली तिमाही की समाप्ति तक सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय निर्धारित सहयोग (आइएनडीसी) के रूप में अपने सहयोग को अंतिम रूप  देना होगा।

इसे सौंपने के लिए निर्धारित अंतिम समय सीमा से काफी पहले से ही बहुत से देश इसे जमा करना शुरू कर चुके हैं। उदाहरण के तौर पर हमें यूरोपीय संघ से और हाल ही में चीन और यूनाइटेड स्टेट से उनके दस्तावेज मिल चुके हैं।

इस समझौते में 190 देश शामिल हैं। ऐसे में अभी बहुत से देशों की ओर से उनके प्रस्ताव आने बाकी हैं। साथ ही हमें आने वाले हफ्तों और महीनों में सभी देशों से बहुत महत्वाकांक्षी प्रस्तावों के मिलने की उम्मीद है।
वित्तीय प्रबंधन भी एक महत्वपूर्ण भाग है जिसमे जन् सामान्य वित्त जो की हरित जलवायु कोष (जीसीएफ) के लिए आर्थिक सहायता प्रदान कर सकता है और एक बड़ी धनराशि एकत्रित करने में लाभ पहुंचा सकता है |  

हाल ही में सरकारों द्वारा लगभग $10 अरब की राशि प्रस्तावित की गयी है यह एक अच्छी शुरुआत है परन्तु यह प्रस्ताव यहाँ लीमा में और २०१५ में वर्षभर अन्य सभी देशों के लिए खुला है जो अपनी आर्थिक संरचना और स्थिति के अनुसार वित्तीय सहायता प्रदान करना चाहते है|  

लीमा जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से व्यवहारिक तौर पर क्या उम्मीद की जा सकती है?

क्रिस्टियाना फिगरेस: लीमा सम्मेलन से बहुत से ऐसे नतीजे मिले है, जिनकी अहमियत पेरिस  सम्मेलन के लिहाज से बहुत अधिक है। मैं उनमें से कुछ के बारे में चर्चा करना चाहूंगी –

आईएनडीसी को ले कर स्पष्टीकरण करे तो जहाँ विकसित देश अर्थवयवस्था आधरित उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य निर्धारित कर रहे है वहीँ पर विकासशील देश अलग अलग प्रकार से विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित अपने लक्ष्य निर्धारित कर रहे है जैसे की ऊर्जा उद्योग और वन एवं उनसे सम्बंधित प्राकृतिक ऊर्जा के संसाधन |

जहां तक 2015 समझौते के लिए मसौदे की बात है, जिस मुद्दे पर फरवरी में जिनीवा में चर्चा होगी मई में उसे सरकारों के साथ साझा किया जाएगा ताकि पेरिस सम्मेलन में इस पर अंतिम मुहर लगा सके।  लीमा में हमारी उम्मीद है कि हम ऐसा संतुलित और व्यवस्थित मसौदा तैयार कर सकें जिसकी दिशा बिल्कुल स्पष्ट हो साथ ही जो बहुत से भारी-भरकम और विभिन्न क्षेत्रों में उलझते सुझावों से लदा हुआ नहीं हो।

लीमा सम्मेलन से और कौन से अहम नतीजे निकल सकते हैं जो पेरिस समझौते की आधारशिला रख सकें?

क्रिस्टियाना फिगरेस: पेरिस समझौते के बारे में माना जाता है कि यह वर्ष 2020 के बाद की तैयारियों के बारे में है, वहीं हमें इससे पहले की जरूरतों के बारे में भी सोचना होगा। वक्त आ गया है कि हम विज्ञान की आवाज को समझें और हकीकत को पहचानें। जलवायु परिवर्तन के लिहाज से हम अपने उपायों को जितना देर से शुरू करेंगे, ये हमारे लिए उतने ही महंगे साबित होंगे और साथ ही इस दौरान इसका असर भी हमारे लिए ज्यादा नुकसानदेह होगा।

इसलिेए अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि ना सिर्फ सरकारों बल्कि शहरों, कारोबारों, निवेशकों ओर नागरिकों को भी इस लिहाज से तत्पर करना होगा। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासिचव के जलवायु सम्मेलन के बाद से हम इस लिहाज से दुनिया भर में कई प्रेरणादायक उदाहरण देख रहे हैं।

हमें लीमा में इस लक्ष्य और साझेदारी की बुनियाद रखनी है।

जलवायु संबंधी वित्तीय जरूरतों को ले कर आपका क्या कहना है?

क्रिस्टियाना फिगरेस: यह तो स्पष्ट है कि वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता को समझ कर ही हम आगे की तैयारी कर सकते हैं।

लीमा में कांफ्रेंस आफ दी पार्टीज की वित्त संबंधी स्थायी समिति एक रिपोर्ट जारी करेगी। इसमें सरकारों से मिलने वाले अरबों डॉलर के वित्तीय संसाधनों के बारे में आकलन होगा। ग्लोबल एन्वायर्नमेंट फेसिलिटी और मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंकों के साथ ही यूनएफसीसीसी के तहत आने वाले विशेष फंड विदेशी विकास सहायता और निजी स्रोतों के बारे में भी इसमें आकलन होगा।

वास्तव में जितनी लोगों को जानकारी मिल रही है, उससे कहीं ज्यादा जलवायु पर वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। इसके बावजूद अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। साथ ही इस संबंधी कमियों को भी बेहतर तरीके से समझने और उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।

इसके अलावा किन मुद्दों पर देशों के बीच खींच-तान हो सकती है?

क्रिस्टियाना फिगरेस: लीमा सम्मेलन के दौरान उन मुद्दों पर भी ध्यान दिया जाएगा, जहां ज्यादा सहयोग की जरूरत है। इनमें अनुकूलन के उपायों से ले कर दीर्घकालिक परिवहन तक शामिल है, जिसमें पर्यावरण संबंधी ही नहीं सामाजिक और आर्थिक लाभ भी संनिहित है।

लीमा में अनुकूलन के उपायों को ले कर एक बेहतर नतीजा आना भी जरूरी है। इसी तरह उत्सर्जन को ले कर कैसे राजनीतिक समानता हासिल की जाए, यह भी अहम है।

कई देशों ने राष्ट्रीय अनुकूलन योजना तैयार कर ली हैं, यहां भी उन्हें कैसे सहयोग किया जाए यह तय करना बहुत जरूरी होगा। साथ ही लॉस एंड डैमेज एक्जेक्यूटिव कमेटी को कैसे व्यवहारिक रूप से संचालित किया जाए यह भी देखना होगा।

जहां तक आइईडीडी प्लस का सवाल है तो देशों को वित्तीय मदद बढ़ा कर जमीनी रूप से इन्हें क्रियान्वित करना होगा।

इसी तरह पिछले कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज में छूट गए मुद्दों पर भी तत्काल चर्चा करने की जरूरत है। जैसे कि दो साल पहले दोहा में बहुत से देशों में इस बात पर सहमति बनी थी कि क्योटो समझौते का दूसरा कार्यकाल भी शुरू किया जाएगा। यह कार्यकाल 2020 तक होगा, जब पेरिस समझौता अस्तित्व में आने वाला है।

मगर अब तक 20 देशों ने भी यह काम नहीं किया है, जबकि इसे क्रियान्वित करने के लिए जरूरी है कि 144 देश इस पर अपनी मुहर लगाएं। लीमा सम्मेलन के दौरान इसको ले कर भी ज्यादा स्पष्टता लानी होगी, ताकि इतने देश इस पर सहमत हो सकें।

वित्त के अलावा तकनीकी हस्तांतरण भी विकासशील देसों के लिए एक विवाद का मुद्दा बना हुआ है। क्या आपको लगता है कि इस मामले पर कोई समाधान हो सकेगा?
क्रिस्टियाना फिगरेस: डीसीएफ पर काम चल रह है और मुझे उम्मीद है कि विकासशील देशों में इस लिहाज से ज्यादा भरोसा जग सकेगा। वित्त संबंधी मामलों को कितनी कामयाबी से लागू किया जा सकता है यह भी लीमा में देखने को मिलेगा।

नए कार्बन बाजारों का उदय हो रहा है, साथ ही ग्रीन बांड और क्लाइमेट बांड जैसे नए उत्पाद बाजार में आ रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि जलवायु परिवर्तन संबंधी उपायों को वित्तीय सहायता अब एजेंडे में ऊपर आती जा रही है।

जलवायु तकनीक केंद्र और नेटवर्क जैसे क्षेत्र में आगे बढ़ने की भी तैयारी हो रही है। इसलिए विकसशील देश भी इस लिहाज से आगे आएंगे और अगले 12 महीने में इस लिहाज से काफी तैयारी हो सकेगी।

जलवायु परिवर्तन पर भारत के रवैये के बारे में आपका क्या आकलने है और आपकी नजर में भारत को इस लिहाज से और क्या करने की जरूरत है?

क्रिस्टियाना फिगरेस: भारत की नई सरकार इस लिहाज से बेहद सकारात्मक भूमिका निभा रही है। भारत से जिस तरह के नए एलान हो रहे हैं, उससे मैं बहुत प्रभावित हूं। इसमें कम कार्बन विकास वाले निवेश को आकर्षित करने से ले कर नवीकरणीय उर्जा को आगे बढ़ाने और डीजल तकनीक का उपयोग सीमित करने के उपाय शामिल हैं।

जिस क्षेत्र में भारत तुरंत बदलाव ला सकता है, वह है अल्पकालिक प्रदूषण पैदा करने वाले कारक। खास तौर पर हाइड्रोफ्लूरोकार्बन्स या एचएफसी। अगर रेफ्रीजरेटर में उपयोग होने वाले रसायन के तौर पर इसका विकल्प बना रहा तो आने वाले समय में ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिहाज से बड़ी समस्या पैदा कर सकेत हैं।

हालांकि मुझे उम्मीद है कि जो तत्व ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं, उनको ले कर खास तौर पर सरकार आगे बढ़ेगी। यह जितना पूरी दुनिया के लिए जरूरी है, उतना ही भारत के लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

भारत के अंदर देखें तो हिमालय की तराई वाले राज्यों या तटवर्ती राज्यों के मुकाबले मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्य जलवायु परिवर्तन के लिहाज से ज्यादा सक्रिय दिखते हैं। कई अन्य देशों में भी इसी तरह के हालात हो सकते हैं, तो क्या आपको लगता है कि सिर्फ राष्ट्र के स्तर पर ही नहीं, उनके अंदर स्थानीय स्तर पर भी इस लिहाज से सक्रियता बनी रहे, इसको ले कर ध्यान दिए जाने की जरूरत है?

क्रिस्टियाना फिगरेस: आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं। इस लिहाज से ना सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि स्थानीय प्रयास भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसी से पता चलता है कि स्थानीय समुदाय इन मुद्दों को ले कर कितना सजग है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान पेरिस समझौते के लिए जो तैयारी होती रही है, उसमें राष्ट्रीय स्तर पर लक्ष्य निर्धारित करने को ले कर महती प्रयास हुए हैं। मगर साथ ही इसको भी ध्यान दिया गया है कि इन प्रयास में सभी संबंधित पक्षों को शामिल किया जा सके। जब तक सभी पक्षों को यह नहीं लगेगा कि यह उनका अपना प्रयास है, तब तक इसे कामयाब भी नहीं बनाया जा सकता।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले समझौते के लिए जरूरी है कि उसे मजबूत और सुदृढ़ राष्ट्रीय कार्यक्रम, नीति और कानूनों की मदद मिले।

तभी इस बात का भरोसा पैदा हो सकता है कि सभी देशों ने जो वादा किया है, उसे पूरा कर दिखा रहे हैं। साथ ही इस बात को भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि सबसे ज्यादा खतरे की आशंका वाले बेहद पिछड़े देश और छोटे द्वीप वाले विकासशील देश भी पीछे नहीं रह जाएं।

अंत में आपसे पूछना चाहूंगा कि आपको अगले साल के पेरिस समझौते से कितनी उम्मीदें हैं?

क्रिस्टियाना फिगरेस: मुझे लगता है कि यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2015 में होने वाला पेरिस समझौता एक झटके में जलवायु परिवर्तन की सभी समस्याओं को दूर नहीं कर देगा। बल्कि यह एक ऐसा मोड़ साबित होगा, जो हमारी नीतियों और हमारी कार्यप्रणाली को एक सही रास्ता देगा। अगले दस-एक साल में हम उत्सर्जन के लिहाज से शिखर पर पहुंच जाएंगे। ऐसे में यह समझौता यह सुनिश्चित करेगा कि हम अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को कार्बनमुक्त करने के लिए गंभीर और मजबूत प्रयास किस तरह चलाते हैं जिससे कि इस शताब्दि के उत्तरार्ध में उत्सर्जन पर काफी हद तक काबू किया जा सके।

- वन वर्ल्ड फाउंडेशन इंडिया