अनुकूलन लक्ष्यित नियोजन: समुदाय स्तर पर जलवायु परिवर्तन हेतु लोचशीलता निर्माण

भारत सरकार द्वारा अनिवार्य बना दिए जाने के पश्चात, देश की सभी राज्य सरकारों को जलवायु परिवर्तन के लिए अपनी राज्य कार्य योजनायें बनानी हैं. ये कार्य योजना निर्माण जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के सिद्धांतों और बिन्दुओं के अनुरूप किया जाना है. सभी राज्यों से ये भी अपेक्षा है कि वे जलवायु परिवर्तन संबंधी रणनीतियों को राज्य की विकासमूलक नीतियों और कार्यक्रमों में मुख्यधारा में शामिल करें.
एक तरफ जहां जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओं को नीतियों में शामिल करना संस्थागत स्तर पर किया जाने वाला कार्य है, वहीं दूसरी तरफ इसे विकास योजनाओं और कार्यक्रमों के स्तर पर ले जाना भी आवश्यक है, इससे स्थानीय समुदायो को जलवायु परिवर्तन से बेहतर अनुकूलन के लिए अवसर मिलता है. खासकर उन खतरों और परिवर्तनो के प्रति अनुकूलन से जो उन समुदायों की सुभेद्यताओं और चुनौतियों से सम्बंधित हैं. इस कार्य में समुदायों और इलाकों के लिए क्षेत्रवार सुभेद्यताओं की पहचान कर समुदायों का क्षमता वर्धन करना, योजना निर्माण व क्रियान्वयन में मदद करने के लिए संस्थात्मक क्षमता वर्धन करना, तयशुदा योजना अनुरूप क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए योजनाओं और कार्यनीतियों में जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओं को शामिल करना भी महत्वपूर्ण है.

इस सन्दर्भ में विकास कार्य के साथ अनुकूलन रणनीतियों के बेहतर समन्वय हेतु कई उपायों और तरीकों की पहचान की गयी है. लेकिन प्रत्येक ऐसा उपाय कुछ नए मुद्दे और चुनौतियां भी पेश करता है:

  • अनुकूलन नियोजन हेतु पारिस्थितिकी आधारित उपाय बनाम प्रशासनिक उपाय
  • समुदाय आधारित विशिष्ठ सुभेद्यताओं पर जोर बनाम क्षेत्रीय सुभेद्यताओं पर जोर
  • नियोजन के लिए तकनीकी सुभेद्यता आकलन (परिमाणात्मक) पर आश्रित रहना बनाम सहभागी सुभेद्यता आकलन (गुणात्मक) पर आश्रित रहना
  • क्षेत्रवार नियोजन बनाम समन्वित नियोजन सम्बंधित बड़ी बहस

समुदाय विशेष के लिए जलवायु परिवर्तन संबंधी अनेक अनिश्चितताओं के सन्दर्भ में ये स्पष्ट है कि अनुकूलन नियोजन सिर्फ इतना ही कर सकता है कि क्षेत्र या समुदाय के लिए प्रासंगिक उन सुभेद्यताओं की पहचान की जा सके जो कि उभर सकती हैं या तीव्र हो सकती हैं. साथ ही ये नियोजन इन बदलावों और के परिणामों को कम करने की दिशा में और उनका सामना करने की दिशा में आवश्यक उपायों की पहचान की जा सके. इस सबके बावजूद कम से कम एक बात के लिए सहमती है, और वो ये है कि अनुकूलन नियोजन को बदलते परिप्रेक्ष के अनुरूप लचीला और नमनीय होना चाहिए.

अनुकूलन नियोजन की ओर बढ़ने के लिए दो बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है
१.    अनुकूलन नियोजन को आपदाओं के सन्दर्भ में देखना और आपदा के प्रति तैयारी या आपदा प्रबंधन की परिभाषा को विस्तार देते हुए दूरगामी जलवायु परिवर्तन जोखिमों को उनमे शामिल करना.
२.    एक अन्य उपाय, हालाँकि ये तुलनात्मक रूप से अभी तक लागू करके नहीं देखा गया है, लेकिन जिसकी बहुत जरूरत है वो ये कि अनुकूलन को सामान्य विकास रणनीति के एक अंग के रूप में देखा जाए और इस बात की कोशिश की जाए की स्थानीय विभाग और समुदाय/गाँव की योजनायें संभाविक जलवायु परिवर्तन खतरों के प्रति जागरूक बनें.

एक अन्य स्तर पर जब हम अनुकूलन नियोजन को कार्यरूप में परिणत करना चाहते हैं और इसे जमीन तक लाना चाहते हैं तब देखते हैं कि इस सम्बन्ध में अलग अलग नजरिये हैं:
१.    एक सी सुभेद्यताओं के साथ जीने वाले समुदायों को साथ में लेकर सीधा काम शुरू किया जाए. ऐसा इसलिए ताकि छोटे पैमाने पर इस उपाय को गहनता से लागू करके देखा जा सके और इससे मिलने वाले नतीजों और सीखों को बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके.
२.    पहले से ही पहचानी जा चुकी सुभेद्यताओं वाले क्षेत्रों में क्षमता वर्धन और सेवा प्रदाय द्वारा ऊपर से नीचे वाली शैली में काम करना और इसके बाद समुदायों के साथ इस तरह के सहयोगी तन्त्र के साथ काम करना.  

ऊपर बताये गये दोनों तरीकों में कुछ अच्छाइयां और बुराइयां हैं. पहला तरीका जहां अधिक जमीनी उपाय बतलाता है लेकिन इसके लिए इसमें लगातार समन्वय और विभिन्न हितधारकों के निरंतर साथ मिलकर काम करने की जरूरत बनी रहेगी. दूसरा तरीका आवश्यक संस्थात्मक ढांचा उपलब्ध कराता है लेकिन साथ ही इस बात का कोई आश्वासन नहीं देता कि स्थानीय स्तर पर क्षमता वर्धन हो सके.

यह जरुरी है कि एक उपयुक्ततम रास्ता ढूँढा जा सके जो कि चुनौतियों को पहचानने में, सुभेद्यताओं के लिए आवश्यक कदम उठाने में, उपयुक्त संस्थात्मक ढांचा और सहयोग तन्त्र और वित्त प्रदाय जैसे मुद्दों को सामुदायिक प्रतिभागिता बनाए रखते हुए हल करें. ये हल सामान्य विकास की प्रक्रियाओं के साथ साथ चलना चाहिए.

एक अन्य बड़ा सवाल जिसके लिए व्यापक चर्चा होना चाहिए वो ये है कि देशव्यापी विकास नियोजन में अनुकूलन लक्ष्यित नियोजन को शामिल करना. स्थानीय सहभागिता के बिना नियोजन जैसे मुद्दों के साथ साथ अन्य मुद्दे भी आवश्यक हैं जैसे कि समन्वय की कमी, ग्रामीण आवश्यकताओं के प्रति योजना आधारित प्रतिक्रियाएं, विविध-स्तरीय योजना निर्माण जो कि अनावश्यक रूप से एकदूसरे के कार्यक्षेत्रों में हस्तक्षेप न करे, स्थानीय आवश्यकताओं के लिए काम करते हुए विभिन्न स्तरों पर होने वाले नुक्सान को बचाना, सहयोगी संस्थाओं की अल्प क्षमता और स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं की अल्प क्षमता के मद्देनजर उनकी क्षमता वर्धन के लिए काम करना, और अन्य सभी आवश्यक कदम उठाना जो अनुकूलन नियोजन और विकास नियोजन की आवश्यकताओं को सही सहयोग दे सके.  

अब समय है की भारत के योजनाकार इस बारे में गंभीरता से सोचें कि नियोजन की प्रक्रिया को ही सुभेद्य समुदायों के लिए लोचशीलता निर्माण के लिए एक सशक्त उपाय की तरह उपयोग किया जा सके.

 

प्रकाशित तिथि:सितंबर 18, 2014
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