सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए सामुदायिक संस्थानों को सशक्त बनाने में मध्य प्रदेश ने दिखाई राह

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ ही दीर्घकालिक विकास का संतुलन कैसे बनाया जाए, इसे इस केस स्टडी से आसानी से समझा जा सकता है। इसे नाम दिया गया है- ‘मध्य प्रदेश के मंडला जिले में सामूहिक प्राकृतिक संसाधनों के संवहनीय प्रशासन का संवर्द्धन’। मंडला में सतपुडा की पहाड़ियों पर स्थित यह इलाका नर्मदा की तीन सहायक नदियों गौर, बैयार और मटियारी का तटीय इलाका है। जिले में अधिकांश आबादी गौंड और बैगा आदिवासियों की है। इस इलाके में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है। लेकिन जिस तरह की खेती अब तक यहां की गई, उसकी वजह से यहां कई समस्याएं पैदा हो गई हैं।

यहां के निवास औऱ बिछिया ब्लाक के 80 गांवों में यह कार्यक्रम चलाया गया। इस कार्यक्रम का मकसद स्थानीय लोगों की जीविका में मदद करने के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देना था। इस दौरान यह सच्चाई सामने आई कि जंगलों के क्षरण का एक बड़ा कारण जमीन का नासमझी भरा प्रयोग और संरक्षण की भावना का अभाव है। यहां उपजाऊ खेती योग्य भूमि की कमी के बावजूद कई कृषि आधारित प्रयास किए गए, जिससे फसल बढ़ सके। यहां की जलवायु के अनुकूल फसलों को बढ़ावा दिया गया।

मध्य प्रदेश के इस इलाके में ‘फाउंडेशन आफ इकोलाजिकल सिक्योरिटी’ (एफईएस) ने ‘जीआईजेड’ संस्था की मदद से यह कार्यक्रम चला कर एक राह दिखाई है। इसने बताया है कि किस तरह ‘विकेंद्रित ग्राम आधारित’ संस्थानों के जरिए समुदाय को संरक्षण के प्रयासों में अहम साझीदार बनाया जा सकता है। इसकी मदद से यहां भूक्षरण में कमी, चारे में बढ़ोतरी, कृषि योग्य भूमि के क्षेत्र में बढ़ोतरी और वैकल्पिक फसलों का विकास मुमकिन हो सका है।

संसाधन प्रकार:व्यष्टि अध्ययन
प्रकाशित तिथि:जून 16, 2014
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