जलवायु परिवर्तन मुद्दों में महिला सशक्तिकरण मुद्दों को शामिल करना

जलवायु परिवर्तन की बहस और सम्बंधित परियोजनाओं और हस्तक्षेपों में महिलाओं के विकास और उनकी विशिष्ठ समस्याओ को शामिल करना एक बड़ी आवश्यकता है. महिलायें जलवायु परिवर्तन के खारों के प्रति अधिक सुभेद्य हैं अर्थात महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में इनका बुरा असर अधिक पड़ने वाला है. भारत की जलवायु परिवर्तन सबंधी राष्ट्रीय कार्य योजना में इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. किन्तु अब इस दिशा में स्थितियों को सुधारने के प्रयास किये जा रहे हैं. हालाँकि यह राष्ट्रीय कार्य योजना गरीब महिलाओं को सर्वाधिक जोखिम वाले समूह के रूप में परिभाषित करती है लेकिन इसके बावजूद अपने आठ अभियानों में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को शामिल करने में असफल हुई है. इसमें भी गौर करने लायक बात ये है कि चार अभियान कृषि और उससे जुड़े अनुकूलन से सम्बंधित हैं.

भारत में राज्य सरकारें इस दिशा में विशेष रूप से संवेदनशील और सकारात्मक रही हैं. और उन्होंने जेंडर से जुड़े मुद्दों को अपने जलवायु परिवर्तन कार्य योजना में शामिल किया है. नीतिनिर्माताओं और नौकरशाहों ने भी स्वीकार किया है कि यह प्रयास अब तक नहीं किया गया था और इसके लिए तकनीकी सहयोग की बड़ी आवश्यकता थी. यह बात दिल्ली स्थित संस्थान “अल्टरनेटिव फ्यूचर” की ओर से सुश्री अदिति कपूर ने कही.

तीन राज्य, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश इस दिशा में अलग नजर आते हैं. “यह महत्वपूर्ण आयाम पूरी तरह अदृश्य ही बना हुआ है, जबकि प्रदेशों में खेती किसानी से जुड़े श्रम में महिलाओं की भागीदारी को महिला कल्याण के दृष्टिकोण से भी देखा जाने लगा है” सुश्री कपूर ने कहा. उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश भी “जेंडर बजट” को एक हकीकत बनाने में जुट गये हैं. “एक बार आप इस दिशा में धन का निवेश आरम्भ करते हैं तब काम होने लगता है” सुश्री कपूर ने आगे जोड़ा. उनके अनुसार यह विमर्श संस्थान (थिंक टेंक) एक सबूत आधारित नीति वकालत शोध पर कार्य करने वाला समूह है जिसका सामाजिक सरोकारों की जमीनी हकीकत से सीधा रिश्ता है.

“हमने अपनी राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना निर्माण हेतु जब 2010 से परामर्श की प्रक्रिया शुरू की थी तभी से लिंग आधारित न्याय के मुद्दों को इस योजना के लेखन में उचित स्थान दिया गया है” श्री लोकेन्द्र ठक्कर समन्वयक, राज्य जलवायु परिवर्तन ज्ञान प्रबंधन केंद्र भोपाल, ने ‘इण्डिया क्लाइमेट डाइलाग डाट नेट’ से कही. “मध्य प्रदेश में ग्यारह कृषि जलवायुवीय झोन हैं, जिन्हें अलग अलग ढंगों से देखने की जरूरत है. हमने मध्यप्रदेश के इक्यावन जिलों की सुभेद्यता को आंकने का प्रयास किया है और सामाजिक और पारिस्थितिकीय मापकों को एकसाथ रखकर देखने या जोड़ने का काम भी किया है. मध्य प्रदेश जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर बहुत पहले ही जागरूक हो चुका है और हमें हमारी बुनियादी जरूरतों का बहुत अच्छे से ज्ञान है.”

साथ ही साथ, चूँकि कृषि एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और सभी सम्बंधित विभागों को एकसाथ काम करने की अपेक्षा रखता है, इसलिए सभी विभागों को एकसाथ एक मंच पर लाने की आवश्यकता महसूस हुई. आरम्भ में यह एक चुनौती थी क्योंकि प्रशासनिक फलक पर कोई संस्थागत ढांचा या मंच ऐसा नहीं था जो इस समन्वय को साध सके. मध्यप्रदेश की उच्च कृषि उत्पादकता वृद्धि दर – जो कि २४ प्रतिशत है वहीं राष्ट्रीय उत्पादकता दर ४ प्रतिशत है – इस बात को देखते हुए यह भय था कि मध्य प्रदेश की दर भी अगले बीस वर्षों में घट जायेगी – यह एक बड़ा उत्प्रेरक था जिसने तेजी से काम करने के लिए प्रेरित किया.

“हम आंकड़ों के अभाव में लाचार हैं, ये आंकड़े विभिन्न विभागों में अलग अलग बिखरे पड़े हैं. हमें अधिक सुद्रढ़ जलवायु परिवर्तन अनुमानों की जरूरत हैं और इसके लिए पूना के ‘इन्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ट्रॉपिकल मिटेरिओलोजी’ को माडलिंग का काम सौंपा हुआ है” श्री ठक्कर ने कहा. श्री जय राज, अतिरिक्त मुख्य संरक्षक वन विभाग उत्तराखंड, के अनुसार एक अन्य समस्या यह भी है कि जमीन और घरों के अधिकार पुरुषों के नाम हैं जबकि अधिकाँश कामकाज महिलायें करती हैं. ‘इण्डिया क्लाइमेट डाइलाग डाट नेट’ से बात करते हुए उन्होंने कहा “हमने इन मुद्दों को उजागर और रेखांकित किया है और इन्हें चर्चा की मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया है”.

उदाहरण के लिए वन विभाग की सभी नर्सरियां महिलाओं द्वारा चलाई जाती हैं और राज्य का महिला व बाल विकास विभाग जलवायु परिवर्तन से अनुकूलन संबंधी मुद्दों को महिला सशक्तिकरण और लिंग आधारित न्याय के नजरिये से देखने और लागू करने का प्रयास करता है.

श्री राज ने यह भी कहा कि किस तरह बैंकों का काम का समय कामकाजी महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं है, सुबह नौ से शाम पांच के बीच महिलाएं खेतों में व्यस्त होती हैं इसलिए बैंकों को हफ्ते में एक दिन कम से कम देर शाम तक खुले रखना चाहिए ताकि वे कामकाजी महिलाओं को सेवा दे सकें.

हालाँकि जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना गरीब महिलाओं को सर्वाधिक प्रभावित समूह की भांति देखती है, इसके बावजूद लिंग आधारित न्याय के मुद्दों को अपने आठ मिशनों में ठीक से शामिल नहीं किया गया है. अल्टरनेटिव फ्यूचर संस्था के अनुसार, इस कार्ययोजना की पूरी कार्यप्रणाली “तकनीकी और प्रबंधकीय दृष्टि सीमित और लिंग आधारित न्याय हेतु असंवेदनशील” कही जा सकती है. इसी तरह राज्यों की कार्य योजनायें भी जेंडर आधारित विश्लेषण और स्थानीय अनुकूलन अभ्यासों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करने में पीछे रह जाती हैं. दूसरे शब्दों में उनमे इन कार्यों के लिए प्रेरणा का अभाव है.

आरंभिक चर्चा के बाद केंद्र सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि इस पूरी जलवायु मुहीम को जेंडर के दृष्टिकोण से संतुलित और समृद्ध बनाया जाए और इसे एक कार्य करने योग्य हकीकत में बदला जाए. एक विशेषज्ञ समिति जो राज्य कार्य योजनाओं का आकलन करती है, ने सभी राज्यों से जेंडर दृष्टिकोण को अपने कार्यों और प्रयासो में शामिल करने की वकालत की है. बिहार की राज्य कार्य योजना में इसके सन्दर्भ मिलते हैं.   

जेंडर की दृष्टि से अल्टरनेटिव फ्यूचर संस्था ने चार राज्यों की कार्य योजना को देखने का प्रयास किया है – इसमें पश्चिम बंगाल आखिरी है. इसमें तीन सुभेद्य कृषि जलवायुवी इलाकों को शामिल किया गया है – गोरखपुर के बाढ़ संभावित क्षेत्र, पूर्वी उत्तर प्रदेश में, आन्ध्र प्रदेश के अनंतपुर में सूखा संभावित क्षेत्र, और पश्चिम बंगाल का समुदी पानी से घिरा और चक्रवात संभावित क्षेत्र सुंदरबन. अनंतपुर से हासिल सबक मध्य प्रदेश के सूखा प्रभावित क्षेत्र बुंदेलखंड के लिए बहुत उपयोगी साबित हुई हैं. कई परिस्थितिगत साक्ष्य जैसे कि परजीवियों की संख्या में वृद्धि के अनुमानो को भी अब वैज्ञानिक अर्थ में समर्थन मिल रहा है.

शोध में ये पाया गया है कि अनंतपुर जिले के मदिरापल्ली गाँव में महिलाओं ने बतलाया है कि किस तरह गर्मी का मौसम किस तरह अब पहले की तुलना में अधिक गर्म होता जा रहा है. वे आजकल पहले की तुलना में एक घंटे पहले काम के लिए घर से निकल जाती हैं और दोपहर एक बजे से पहले ही लौट आती हैं क्योंकि तेज धुप में वे काम नहीं कर सकतीं. ये उत्तर प्रदेश की महिलाओं के लिए एक हकीकत है यहाँ तक कि हिमाचल प्रदेश में भी “बारिश में कमी से जमीन में नमी घट रही है और इससे परजीवियों में और खरपतवारों में बढ़ोतरी हो रही है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर के सदेयाखुर्द गाँव की मंजूबाई कहती हैं कि खरपतवार निकालना मेरा काम है, मेरे पति का नहीं इसलिए मुझे अब अपनी खुरपी लेकर पूरे समय तैयार रहना पड़ता है. वहीं दूसरी ओर इसी राज्य के गोरखपुर में महिलाओं ने बतलाया कि किस तरह खेत में बारिश का पानी जैम होने की वजह से एक भी अरहर का पौधा नहीं पनप सका है. जनकपुर गाँव की कमलावती कहती हैं कि अरहर के पौधे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, इनसे घर में चूल्हों में जलाने के लिए लकड़ी और चारा भी मिल जाया करता  है. उन पौधों से हम झाडू भी बना लिया करते है और उन्हें बेचते भी हैं. इसी अरहर से हम छोटी छोटी डलिया और घर की छप्पर भी बनाते हैं. आजकल जिले में औरतों और मर्दों की इकट्ठी बैठकें होती हैं और साझा ढंग से ये तय किया जाता है कि जलवायु परिवर्तन की मार का सामना करने के लिए कौनसे उपाय किये जाने चाहिए.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केन्द्रीय शुष्क भूमि शोध संस्थान (CRIDA) हैदराबाद ने महिलाओं पर जलवायु परिवर्तन की मार कम करने के लिए कुछ उपाय शुरू किये हैं. इन उपायों में शारीरिक मेहनत कम करने के लिए सरल और छोटी मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के अभ्यास शामिल हैं, फसलों की एक से अधिक वेराइटी लगाना, चारा उगाना और बीजों को इकट्ठा करना भी इसी दिशा में अन्य उपाय हैं.   

संस्था अल्टरनेटिव फ्यूचर द्वारा की गयी शोध भी इस बात पर केन्द्रित है कि महिलायें किस तरह से जलवायु परिवर्तनशीलता से अनुकूलन कर सकती हैं. जैसा कि आन्ध्र प्रदेश के रंग रेड्डी जिले की मल्काईपट्टी टांडा की गोम्लिबाई बतलाती हैं “हमने अपने सवा-सहायता समूहों की बैठक में इस बात की चर्चा की कि एक सूखे इलाके में पानी मिल बांटकर इस्तेमाल करना क्यों जरुरी है. ज्यादा नलकूप खोदने से जमीन का जलस्तर और अधिक नीचे गिरता जाएगा. यह बात अपने लोगों को समझाने में हमें कुछ समय लगा लेकिन अब हमने आपस में मिलकर एक समझौता कर लिया है. मंडल कार्यालय से मिलकर ये समझौता किया गया है की अब नए नलकूप नहीं खोदे जायेंगे और पुराने ही नलकूपों से नए लोगों की जरूरतें पूरी की जायेंगी. अब हमारे पास पर्याप्त पानी है और हम आजकल सब्जियां भी उगा लेते हैं.”

अल्टरनेटिव फ्यूचर की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का अनुकूलन अभियान चार बिन्दुओं के आसपास रचा जाना चाहिए:

  1. सभी योजनाओं और कार्यक्रमों की योजना निर्माण और अनुपालन में महिलाओं को शामिल किया जाए और उनकी स्थितियों में सुधार पर विशेष ध्यान दिया जाए.  
  2. सब तरह के कार्यक्रमों को जिला स्तरीय और पंचायत स्तरीय एजेंसियों के जरिये जोड़ा जाए.
  3. जमीनी स्तर पर महिलाओं का सशक्तीकरण और क्षमता वर्धन किया जाए.
  4. मुख्य हितधारकों से मिलकर साझे प्रयास करना. जैसे कि अनुकूलन वैज्ञानिक, सरकार, सरकारी विभाग, नागरिक समाज समूह, उपयोगकर्ता समूह, सर्वाधिक सुभेद्य समूह लाभ के लिए देशज और पारंपरिक ज्ञान के आलावा वैज्ञानिक नवाचार को बढ़ावा देना.  

सन १९९५ में राष्ट्र्री महिला आयोग द्वारा ‘कृषि क्षेत्र में महिलायें’ विषय पर किये गये एक अध्ययन के अनुसार महिलायें खेतों का लगभग साठ प्रतिशत काम करती हैं और साथ ही पुरुषों के कामों में अन्य तरह से सहयोग भी करती हैं. साथ ही खेती से जुड़े अन्य कार्यों में भी उनकी भागीदारी रहती है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के वर्ष २०११ के अध्ययन में यह बात सामने आती है.

भारत की महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना जो कि राष्ट्रीय कौशल विकास परियोजना के अंतर्गत चलाई गयी थी, यह बतलाती है कि जलवायु के प्रति संवेदनशील इस कृषि क्षेत्र में कुल सक्रीय और कामकाजी महिलाओं का असी प्रतिशत काम करता है. आगे यह बतलाती है की “भारत के गाँवों की लगभग सभी महिलायें किसी न किसी रूप में किसान समझी जा सकती हैं. चाहे वे खेतिहर मजदूर हों, अपने ही खेतों में बगैर मूल्य लिए काम करने वाली हों, या इन दोनों तरह से काम करने वाली हों.”

संसाधन प्रकार:नीति संक्षेप
प्रकाशित तिथि:नवंबर 17, 2014
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